Sunday, August 17, 2008

हे भारतमाता!

हे भारतमाता।
अजर, अमर, अटल देश हो, हे भाग्यविधाता
खिले हर कोख में एक दूर दृष्टिदाता
प्रेम, माधुर्य, भाईचारे बनी रहे ये अविरल गाथा
हे भारत माता हे भारत माता।

बनी पड़ी मिसाल है, अखंड कथा निहाल है।
धरा पर बिखरा तेज है, ये संस्कृति की सेज है।
नदी की धार सार है, यहां भूमि आधार है।
हर नजर में स्वप्न है, कर्म यहां धर्म है।
हर बात में दर्शन है, हर साथ में समर्पण है।
हर ओर छाया उजाला है, हर पंथ यहां निराला है।

आशाओं के विस्तार में व्यक्ति की पहचान है।
इस देश की बात में हर अर्थ बस महान है।
जन मन गण, भारत भाग्य विधाता
हे भारत माता, हे भारत माता।

एक राह का सफर, चल रहे कई डगर।
एक चाह का नगर, खोज रहे सभी मगर।
एक धर्म का चौराहा, हर किसी के लिए दोराहा।
एक जीवन का सत्य, न मिले तो लगे सूर्य अस्त।
एक सच का रहे भान, देश के साथ मिलें है प्राण।

एक भूमिका रहे हमेशा, छोड़ जाएं कुछ अनोखा।
दो इस बात का वरदान, रहे हमें देशभक्ति का भान।

हे भारत माता। हे भारत माता। हे भारत माता।

Tuesday, May 20, 2008

ब्लागों का कट-कापी-पेस्ट

बहुत दिनों से ब्लागों की दुनिया से दूरी रही। पता नहीं क्यो। मन नहीं करता था कि किसी एग्रीगेटर पर जाकर तलाशूं कि क्या पढ़ू, क्या छोड़ू। ये अजीब सा समय है। सुबह अखबार की खबरों से लेकर टीवी समाचार तक पसरी सूचनाओं की भीड़ में खुद को तलाशना कठिन है। अखबारों के पन्ने ज्यादा होते है। वजन ही पचास से सौ ग्राम होता है। अपितु हिंदी अखबारों के पन्ने हल्के होने लगे है। टीवी पर दौ सौ चैनलों में समरूपता हावी है। खबरें, फिल्में, सीरीयल्स सब एक ही पन्नी में लपेटे लगते है। ब्लाग पर लेखन से एक विविधता के दर्शन होते थे। लेकिन क्लिकर्स की भीड़ खींचने के लिए यहां भी लेख, कविता, विश्लेषण के नामों को लेकर एक्सक्सूजिविटी दिखने लगी है। ये बीमारी है। हर कोई भीड़ खींचने के लिए अनोखे, विडंबना भरे शीर्षकों को चेप रहा है। ये कट कापी पेस्ट जैसा लगता है।

ब्लाग की ताकत भाषा है। यानि कि वो आधार जिसके बल पर उसे रचा जा रहा है। हिंदी एक व्यावसायिक भाषा नहीं है। इसका अंदाजा साहित्यधर्मियों से लेकर आईटी प्रबंधकों को बेहतर है। आज ही पढ़ा कि देश में पांच करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है। इनमें से चार करोड़ शहर में, नब्बे लाख गांवों में। इसी सर्वेक्षण में था कि अंग्रेजी के इस्तेमाल में इसमें 23 से 49 फीसदी लोग जुटे है। यानि कि इंटरनेट की भाषा है अंग्रेजी।

अंग्रेजी भाषा में जो ब्लाग अति लोकप्रिय रहे, वो किसी न किसी माहौल के कारण जाने जाते रहे। चाहे चीन की एक अभिनेत्री का ब्लाग हो या अफ्गानिस्तान के एक भुक्तभोगी का ब्लाग। इनमें रहस्य और प्रस्तुति के पूरे साजोसामान थे। और था मानव उत्सुकता का इंतजाम। ये बात अभी तक हिंदी ब्लागरों में नजर नहीं आती। वो किसी प्रकार से विश्व को कुछ अनोखा नहीं बता रहे है। मैं रामचरितमानस, और अपने प्राचीन वांग्मय के लिए हिंदी ब्लागरों को साधुवाद देता हूं। लेकिन क्या तकनीकी के इस्तेमाल से उन्हे आडियो प्रस्तुति के लिए तैयार करने की जरूरत पर जल्द से जल्द विचार नहीं होना चाहिए। जिससे वो पढ़ने की जहमत के बचने वालों के लिए भी लुभावने हो।

आज भी हम इंटरनेट को नया अनोखा, तात्कालिक शोध, खोज और व्यक्तिगत सूचना के लिए ही ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है। ऐसे समय में जब समय देने के लिए एक मूल्य चुकाना पड़े, तो किसी का सामान्य लिखा पढ़ना समय और पैसे दोनों की फिजूलखर्ची सरीखा होगा। ये ध्यान रखें कि मध्यमवर्गीय शहरों में साइबर कैफे पर वक्त बिताने वाला युवक चाहता है अनोखा और मनोरंजक।

एक ट्रेंड का पीछा करके बीते वक्त में कई अनुत्पादक ब्लगों की एक झड़ी सी देखने को मिलती है। मीडिया की कलई खोलते, अपनी मन की पुकार वाली कविताएं, कई समस्याओं पर बहुकेन्द्रित ब्लाग, अनावश्यक सूचनाओं वाले ब्लाग, ऐसे तमाम प्रयासों की सचाई है कि वे आज भी तलाश रहे है पाठक। पाठक की रूचि को भांपना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। सभी माध्यमों के लिए।

जारी रहूंगा....

'भव्य'

Friday, January 11, 2008

"चजइ"- "क्या खुद को जानना है"?

अपने को जानने समझने के लिए अब तक भारतीय परंपरा में ध्यान ही सबसे बड़े माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के सालों में बाजार में आ गई है स्व-विकास, स्व- मूल्यांकन और लाइफ और प्रोफेशनल मैनेजमैंट की हजारों किताबें। तो क्या है इन किताबों में, जो दिखा रहा है हर सफल-असफल इंसान को एक सपना। थोड़ा पीछे चलना होगा। व्यक्ति को उसके व्यवहार में कुशल और आसपास ज्यादा चर्चा दिलाने के लिए 1937 में डेल कार्नेगी ने लिखी एक किताब। हाऊ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लूएंस पीपुल्स। इस किताब को पढ़कर आप ये जानेंगे कि कुछ चीजों को अपनाकर आप कैसे जीततें है अपने का मन। और कुछ चीजों को बरत कर आप हो जाते है चर्चित।

ये तो महज एक शुरूआत थी। इस किताब की अपार सफलता के बाद, तो मानो इंसान की सबसे बड़ी ललक को भुनाने के लिए छपीं थड़ाथड़ किताबें। वैसे पश्चिमी देशो में लोगों को अमीर बनाने वाली नेपेलियन हिल और स्वेट मार्टिन की किताबें मौजूद थी। लेकिन इंसान को अमीर बनाने की चाहत को भुनाने की इस कड़ी के बाद जोर व्यक्तित्व विकास को बेहतर बनाने पर रहा। भारत में इसे लेकर जो चर्चा छिड़ी, वो यू कैन विन से परवान चढ़ी। इस किताब में सैकड़ों किस्से थे, जो इंसान की क्षमता और चाहत के बीच एक पुल बना रहे थे। इसने वो कर दिखाया, जो तब वक्त की जरूरत थी। यानि कि जागरूकता। अपने अंदर छुपे गुणों की। उनको खोजने की। और ये एक हद तक नैतिक ज्यादा रही।

लेकिन ये खोज ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। किताब में किस्सागो बेहतर था, लेकिन आज के युवा और व्यस्त भारत ने इसे पढ़कर किनारे रख दिया। नैतिकता से क्षमता के नाते को समझाने में ये किताब नाकामाब रही। मैनेजमेंट शायद सबसे बड़ी रूकावट थी। हर कहीं ऐसा कारीगरों, या कहें कि प्रोफेशनल्स की जरूरत थी, जो प्रबंधन कर सकें। लेकिन भारतीय विकसित कामगारों के पास निजी जीवन से व्यवसायिक जीवन तक किसी तरह का खास प्रबंधन नहीं था। वे अनुशासित या अनुशासित तो थे, पर विचारों की गढ़ी-पढ़ी श्रंख्ला से कैद नहीं। वे नियम बनाने में यकीन तो रखते है, लेकिन जरूरत पर उन्हे तोड़ने में गुरेज नहीं करते। सो अमीर बनाने के ख्वाब, नैतिकता के क्षमतावान सबक, सब पीछे छूटे रह गए। नया मंत्र था मैनेजमेंट।

हर संभव कोशिश की बड़े पदों पर बैठे, प्रबंधन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों और पालिसी के क्रियांवित करवने वालों ने। इस तरह की किताब छापी जाए कि वो किसी तरह माहौल को बनाए। एक ऐसा माहौल जो अपने आप कारीगर पैदा कर दे। कठिन सोच। लेकिन हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू गैलप जैसी तमाम बड़ी शोध संस्थओं ने समय समय पर शोध के बाद मैनेजमेंट से जुड़ा अपने अपने निष्कर्ष दिए। ये कहीं न कहीं किसी एजेंडा को फैलाने या एक निजी शोध के बखाने वाले रहे। मैनेडमेंट के जमीनी सिद्धांतों को या तो किसी कंपनी की सफलता के बाद या किसी नई कंपनी में किसी फार्मूले को अपनाने के बाद कारगर माना जाता है। तो ऐसे में किसी नए उद्यमी के लिए इनके बल पर निवेश की कोशिश हमेशा से कमजोर दांव मानी गई।

लेकिन मैनेजमैंट के खिलाड़ी इसे तोड़ तोड़ कर हर अंग को पेश करने लगे। अंग। यानि स्ट्रक्टर, इंफ्रास्ट्रक्टर, ह्यूमन रिसोर्स, वर्किंग एनवायरमेंट, पालिसी, और किसी भी कंपनी की रीढ़ यानि कि इम्प्लाई के स्ट्रेंथ को बढ़ाने के फार्मूले। आज जिस चीज पर सबसे ज्यादा फोकस है वो है आपकी क्षमता। इसके लिए ये जरूरी है कि आप जानें कि आप में क्या क्या गुण है, आप की अच्छाईयां और बुराईयां क्या है। और क्या आप अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर पा रहे हैं। इसके लिए बीते सालों में कई किताबें छपी। लेकिन जिस सीरीज को द इकानामिस्ट ने भी सबसे बेहतरीन माना है, वो है गैलप के साथ स्ट्रेंथ फाइंडर की। इस सीरिज के तहत बाजार में छह किताबें उतर चुकी है। और अगर गौर करें तो इनमें सबसे ज्यादा प्रभावी रही नाऊ डिस्कवर योर स्ट्रेंथ। मार्कस बकिंघम की इस किताब में वो सब लिखा है, जिसका आपको निजी और व्यवसायिक जीवन में काम पड़ता है।

लेकिन क्या पढ़ कर और कभी कभी उसे अपनाकर आप सफल हो सकते है। ये इसपर भी निर्भर करता है कि सफलता आपके लिए क्या मायने रखती है। कभी कभी पद या पैसा वो सब नहीं देता, जो मन का काम करना देता है। ज्यादा जरूरी है कि आप ये जाने कि आप कैसे वयक्ति है। इसके लिए तमामा शोध हुए। जिस एक शोध को आप अपना सकते है, वो किया है यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया ने। आथेंटिक हैपिनस सिरीज के तहत इसे नाम दिया गया वाया सिग्नेचर स्ट्रेंथ क्वेश्चनेयर। आप यहां पर जाकर, अपने आप को एनराल कराकर पा सकते है वो चौबीस गुण, जो 240 सवाल के मल्टिपल जबाव के बाद आता है। ये मानक तो हो ही सकता है। दरअसल कई सालों के बाद की रिसर्च के बाद ये सवाल आपको ये बता पाने में सफल होते है कि आपके पांच प्रभावी गुण क्या है और इक्कीस अन्य गुण।

खैर। खुद को मानसिक और व्यावहारिक तौर पर संवारने की इस कवायद में हम आप न भी लगे हो, तो भी खुश रह सकते है। क्योंकि किसी न किसी तौर पर हम आप करते वहीं है, जो हमें थोड़ा बहुत संतुष्टि देता है।

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भव्य foryou2005@gmail.com

"चजइ"

Thursday, August 23, 2007

A chapter on Media Law & Ethics.

Hello,

Big things happen rarely! It’s a big achievement for me to be on paper! I wrote a “chapter on electronic media ethical issues” and it got published in a book, it’s a dream come true for me……I share the Preface and Content with u all….Need your insights for a future, which is very dedicated to electronic media.

Bhavya

http://cyberjournalist.org.in/medialaw.html

http://bhavyakiduniya.blogspot.com/

Books


Media Law and Ethics: Readings in Communication Regulation

Edited by
Kiran Prasad


2007; ISBN 81-7646-604-2; Pp xxviii + 457; Rs. 1200 (HB)
B.R. Publishing Corporation, BRPC (India) Ltd,4737 A/23, Main Ansari Road, Darya Ganj, New Delhi – 110002.

There are many books on media law and communication ethics, but today journalism and communication studies are being transformed by new media and communication convergence. This book tries to unravel the complication
and updates the curriculum on communication regulations. This book is designed keeping in mind the UGC Core Curriculum for the course Media Law and Ethics offered at the Masters Degree for students of Journalism, Mass Communication, Electronic Media, Public Relations and Advertising Studies in the Indian Universities.

Every journalist and journalism student - from the traditional print media to the modern convergent media - should know the legal and ethical aspects of publishing a story. There are two main aspects of media regulations: 1) media laws about the publication of a story which may relate to libel and defamation; and 2) media laws about permissible comments on legal proceedings which include contempt of court.

A journalist must also make ethical choices about each story apart from its possible legal implications. This book examines not only the laws governing the media but also ethical issues in everyday journalism. The chapters in the book have focused on the existing challenges in communication regulations and also throw light on the emerging ethical concerns in the global media environment.

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Content

Preface
Editor and Contributors

Theoretical Foundations of Communication Regulations

1. Freedom, Regulation and Ethics: Market, State and Media Accountability System - Claude-Jean Bertrand
2. Communication and Values - Kiran Prasad
3. A Theory of Media Ethics: Foundation and Key Issues - Kiran Prasad
4. Satellite Broadcasting Regulation and Cultural Exception: An Arab Islamic View of Communication
- Basyouni Ibrahim Hamada

Press and Broadcasting Regulations

5. Laws and Regulations Governing Press Freedom in India
- P. E. Thomas
6. Laws and Regulations in Indian Broadcasting
- G. Nagamallika
7. Foreign Direct Investment in Print Media: Legal and Ethical Issues –
- Roy Mathew
8. Freedom, Individualism and Ethical Behaviour: A Comparative Study of Print and Electronic Media Journalists
- Kiran Prasad

9. Electronic News Media and Emerging Ethical Issues -Bhavya Srivastava >(http://foryou2005.googlepages.com/)New Media and Content Regulations

10. The Legal Capture of New Media Technology
- Lawrence Liang
11. Indian Cyber Laws
- Umesh Arya
12. Cyber Journalism: Legal and Ethical Issues
- Pradeep Nair
13. All Rights Reserved?: Cultural Monopoly and the Troubles with Copyright in the Age of the Internet
- Michael Geist
14. Pornography and Women’s Sexuality in the Legal Web
- Kamayani Bali Mahabal
15. Protecting Minors against Harmful New Media Content: Perspectives on Content Regulation in the Digital Media
- Eva Lievens

Regulations in Functional Communication

16. Emergency and Censorship: The dark side of Indian Democracy
- Shaju P.P
17. Media and Legislative Privileges: A Case Study
- Nirmaldasan
18. Regulatory Challenges and Ethical Issues in Public Relations and Advertising
- Waheeda Sultana
19. Right to Information and Communication Regulations in India
- Kiran Prasad

About the Editor: Kiran Prasad is Associate Professor in Communication and Journalism, Sri Padmavati Mahila University, Tirupati, India. Recently she was awarded the Commonwealth Academic Staff Fellowship and was Visiting Research Fellow at the Institute of Communication Studies, University of Leeds, UK. She was Canadian Studies Research Fellow at the School of Journalism and Communication, Carleton University, Ottawa, Canada. She is also the youngest ever recipient of the ‘State Best Teacher Award’ for university teachers from the Government of Andhra Pradesh, India. A prolific writer and well known Indian communication philosopher, she is author/editor of over fifteen books. Her theoretical contributions include a conceptual model of Ethics Affecting Variables (EAV) in Communication; an analytical framework and conceptual model on Media Policy Affecting Variables for the implementation of media policy in the developing countries; and a conceptual model on Voting Behaviour Affecting Variables in Political Communication Campaign. She has specialized in several branches of communication and has successfully guided doctoral degrees in communication and journalism. She can be reached at kiranrn_prasad@hotmail.com; kiranrn.prasad@gmail.com

Also from the same author: Information and Communication Technology-Recasting Development

Wednesday, August 22, 2007

नगर नगर एक सफर - भाग 2

अलीगढ़ में रूकना कुछ ही घण्टे रहा। सो जानने समझने का पूरा वक्त मिल नहीं पाया ।आगे एक ऐसे शहर को जाना था, जहां रेल नहीं जाती है। मैं पूर्वोत्तर राज्यों या जम्मूकश्मीर में नहीं, अपने राज्य उत्तर प्रदेश के एक नगर की बात बता रहा हूं, जहां रेल नहीं जाती।

एटा। एक ऐसा शहर जिसके बारे में आप किसी भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाशिंदे से पूछेंगे तो वो कहेगा, हां एटा, वो तो इटावा के पास है कहीं। जैसे शहर का दूसरा मोहल्ला हो। लेकिन वो ये भी बताने में सक्षम नहीं होगा कि इटावा कहां है।

एटा, जिला है। जो आगरा डिवीजन में आता है। इसके उत्तर में बदायूं, पश्चिम में अलीगढ़, हाथरस, मशुरा और आगरा, दक्षिण में मैनपुरी और फिरोजाबाद और पूर्व में फर्रूखाबाद बसा है। तो मैं एटा जा रहा था, पश्चिम में बसे अलीगढ़ से। यहां से एटा जाने के लिए कई साधन थे। सभी सड़को पर चलने वाले। जाहिर है एक जागरूक नागरिक के तौर पर मैने सरकारी बस को ही चुना। क्योंकि दस बीस मिनट की जल्दी के लिए मैं किसी जीप या गाड़ी में दब कुचलकर सौ की गति से उड़ते वाहन में बैठने का जोखिम नहीं लेना चाहता था।

बस ड्राइवर के पीछे की सीट पर बैठा। और गाड़ी ने गति पकड़ी। रोड़ काफी खराब थी। लेकिन मन खिड़की से आती हवा के साथ बहने लगा। रास्ते में एक ढाबे पर बस रूकी। अनाधिकृत तौर पर। पर ये चलता है साहब। आप भारत में सुविधा से ज्यादा चलने को तरजीह देते है। सो हम उतरे। लघुशंका आदि के बाद जो चाय सुड़की गई, वो भारत में बनी बढ़िया चाय को मात देती मालूम होती थी। चाय पीने का शौक है। सो दो गिलास पी ली। केवल चार रूपए में। वैसे दिल्ली की सैकडों की चाय भी अब मंहगी नहीं लगती। शौक जो है।

बस चली। ग्रांड ट्रंक रोड। जिसे शेरशाह सूरी ने बनावाया। सोलहवीं शताब्दी में बनी एक विशाल पथ। जो बंगाल के सोनारगांव से आगरा के सासाराम तक बनी थी। शेरसाह सूरी के गुजर जाने के बाद इसका विस्तार हुआ। आज ग्रांड ट्रंक रोड ढाई हजार किलोमीटर की दूरी पर पसरी है।

पर जिस ग्रांड ट्रंक रोड पर ये बस गुजर रही थी, वो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से गुजर रही थी। यानि कि इसे भी इसका गुमान होना ही था। सो बड़े गड्ढ़ो, सड़क हिचकोले खाती बस में हमें रास्ते का अहसास हो गया। बेहद ही खराब थी ये सत्तर किलोमीटर का रास्ता।

खैर एटा पहुंचा। एटा में छह तहसीलें है। तहसील यानि जिले को प्रशासनिक तौर पर नियंत्रित करने के लिए एक ईकाई। हर तहसील का एक प्रशासनिक प्रभारी होता है, जो राज्य लोकसेवा आयोग से चुना जाता है। जिसे उत्तर प्रदेश में पीसीएस कहते है। वो तहसील का प्रशासनिक काम देखता है और उपजिलाधिकारी होता है।

एटा में जो सबसे प्रचलित शब्द है, वो है पकड़। यानि माल जब्त करना नहीं। बल्कि आपका अपहरण। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में अपराध ज्यादा है। वजह जमीन और राजनौतिक हस्तियों की दखल है। मैने एक जानने वाले से जाना कि पकड़ की कीमत क्या है। यानि फिरौती का हिसाब क्या है।

चौंकिएगा नहीं। क्योंकि ये आपके जीडीपी या पर कैपिटा इनकम से नहीं समझ आएगा। आपको इसके लिए देश के गांवों में जाकर एक समय का राशन खरीद कर खाना होगा। या शहर में दिहाड़ी पर जीते लोगों का जीवन समझना होगा। पकड़ एटा में आए दिन का बात है और पकड़ से छूटने की कीमत भी आम दिन की जद्दोदजहद के बराबर। यानि किसी पकड़ की कीमत दो हजार है तो किसी की एक साइकिल या भैंस।

लेकिन ये काफी है देश के हालात को समझने के लिए। जहां मुबई में एक जवान की मौत के पीछे दो करोड़ की फिरौती की बात है तो, भारत के एक जिले में उसकी जान की कीमत है मात्र दो हजार रूपए। ये असंतुलन बताता है कि देश में दरार कितनी बड़ी है।

मैं एटा दो दिन रहा। निजी काम था। हो गया। आगे का सफर करना था। आगरा पहुंचना था। आगरा गए सालों हो गए थे। ताजमहल को देखने की तमन्ना थी। सो रहिएगा साथ। दिखाता हूं आपको ताज का एक नया चेहरा।

Friday, August 17, 2007

नगर नगर एक सफर....

बीते दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ शहरों में जाना हुआ। खासकर आगरा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले उतनी ही दूरी पर बसते है जितनी दूरी पर द्वारका से आनंदविहार या कल्याण से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल आने में लगते है। यानि एक घण्टे में एक जिले में तो दूसरे घण्टे में दूसरे जिले में। शुरूआत अलीगढ़ से हुई।

सुबह के चार बजे है। दिन पंद्रह अगस्त। मैं अलीगढ़ में हूं। ये शहर अपनी संजीदगी और सरगोशी के लिए पहचाना जाता है। यहां के माहौल में तनाव बना रहता है। कुछ बना बनाया तनाव। लेकिन अलस्सुबह आजादी की साठवीं वर्षगांठ पर शहर की सड़को पर एक परछाई थी। ज्यादातर घरों, दुकानों पर झालर लटकी थी। जिससे चकमक चकमक रोशनी सड़को पर उजाला और अंधेरा कर रही थी। अलीगढ़ के स्वभाव की तरह।

सुबह सुबह मुझे जो दिखा, वो हर छोटे शहर में सुबह देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के बाहर जिंदगी जिंदा थी। चाय पी कर आगे बढ़ा। तो देखा कि दिन की ही तरह हर निकलने वाले को अपनी ओर खींचने वाले रिक्शेचालक पूछ रहे थे कि कहां जाएंगे। मन खट्टा हो चला है। क्या हर शहर में पता होना जरूरी है। मेरा सफर लम्बा था।

मैं बाहर आकर, रिक्शों वालों को छोड़ता हुआ। पैदल ही बढ़ गया। रेलवे स्टेशन के आगे से बाई तरफ जाकर मैं चलता गया। सड़को सूनसान थी। मकानों, दुकानों पर सजे झालर रोशनी की आंखमिचौली खेल रहे थे। मैं भी आंख ही मिचमिचा रहा था।

जैसा अलीगढ़ के बारे में हमेशा सुनता आया था, उससे अलग अहसास हो रहा था। शांत और सुकून भरा। आज के दिन का अहसास भी माहौल को अलह बना रहा था। पन्द्रह अगस्त। देश को आजाद हुए आज साठ साल हो गए। और अगर इस चीज को समझना हो तो अलीगढ़ से बेहतर क्या होगा।

दिन आगे था। मेरे पास केवल कुछ समय था, शहर समझने को। एक खुलती दुकान पर बैठकर मैने चाय की इच्छा जताई। उसने कसमसाते हुए कहा कि थोड़ी देर लगेगी। मैने कहां कोई बात नहीं। बैठा रहा। फिर चाय वाले ने कहां कहां से आए है। मेरे हाथ में बैग था। और भारत में ये यात्री होने की पहचान है।

बात आगे बढ़ी। पता चला कि चायवाला अलीगढ़ की मूल निवासी है। पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। अलीगढ़ के इतिहास से लेकर आज तक सब बताया। मैने पाया कि भले ही इस शहर में सांप्रदायिक तनाव रह रह कर आता जाता रहता हो, लेकिन सदभाव की मिसाल इस शहर ने भी कायम कर रखी है। राजनैतिक तौर पर तो ये साफ दिखता है। अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में से छह पर हिंदू प्रतिनिधि चुने गए है। जिनमें से दो तो भाजपा है। ये अलग बात है कि शहर की कमान समाजवादी पार्टी के पास है।

चाय पक चुकी थी। छानी जा रही थी। तलब बढ़ गई थी। अमर उजाला अखबार आ चुका था। देश की आजादी की साठवीं वर्षगांठ की खबरें थी। लोकल पन्नों में हिंसा भी खबरों में थी।

मेरा सफर आगे बढ़ना था। सो इस शहर में मेरा समय पूरा हो चुका था।

आगे जारी रहेगा....

Tuesday, July 3, 2007

नीली पीली बसों का खौफ


दिल्ली में चलना है तो सभंलना जरूरी है। और अगर सड़क पर किसी ब्लूलाइन बस के आस पास है तो दूरी जरूरी है। सरकार भी दूरी के फार्मूले को अपना रही है। आज ही दिल्ली सरकार की मुखिया ने कहा कि धीरे धीरे सड़कों पर से साढ़े चार हजार ब्लू लाइन बसों को हटा दिया जाएगा। तो मुसाफिर चलेंगे कैसे। इसके लिए होंगी। हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों को इनकी जगह लगाया जाएगा। तो यानि दिल्ली को इस रौंदती आफत से निजात दिलाने के लिए करोड़ो खर्च होंगे।

क्यों ब्लू लाइन बस वाले नहीं मानते कि उनसे ऊपर सड़क पर कोई है। क्यों वे एक चक्कर को कम समय में पूरा करना चाहते है। इस देश में करोड़ों लोगों को दिल्ली की इस खतरनाक पीली नीली बस में सफर करने का मौका नहीं मिला होगा।

दरअसल सड़को पर नम्बर रूटों से दौड़ने वाली ब्लू लाइन बसों को एक दिन में चार से पांच चक्कर लगाने की अनुमति होती है। लेकिन इससे न तो रोजाना का खर्चा निकलता है और न ही थानों में दी जाने वाला सुविधा शुल्क।

तीन हजार बसें रोजाना लाखों लोग को दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाती, ले आती है। इनका किराया भी दो, पांच सात और दस रूपए। एक ऐसे शहर में जहां रहने के लिए मकान हजारों में हो, महीने के दौड़ भाग का किराया दौ सौ के करीब हो तो, बात अखरती नहीं है।

दिल्ली के हर चौक से गुजरने वाली इस पीली नीला बसों के मालिक सफेद कपड़े वाले लोग है। या उनके गुमनाम रिश्तेदार। एक एक मालिक के पास 20-40 गाड़िया है। और है हर रूट के थानेदार का पर्सनल नम्बर।

तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जिन चौराहों पर धड़ाधड़ चालान कट रहे थे, उनपर ही कैसे बसें लोगों पर चढ़ रही है। क्या सरकार इसे जान बूझकर बर्दाश्त कर रही है। जिससे मंहगी हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों के लिए आधार बनाया जा सके।

ब्लू लाइन बसों के रोडाना रवैये को सुधारने के तरीके अभी भी सरकार के पास है। बशर्ते अधिकारियो की जेब में अब कागज ज्यादा और पैसे कम हो। हर ब्लू लाइन पर सरकारी ट्रेंड स्टाफ और स्पीड गवर्नर, एक ऐसी मशीन जो गति को नियंत्रित करती है, लगाकर बसों को समझदार बनाया जा सकता है।

रही बात ट्रैफिक नियमों के पालन की तो डर अभी भी बरकरार है। लेकिन सड़कों पर नाचती ब्लू लाइन बसों का डर इस नियम के डर से ज्यादा महसूस होने लगा है।

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