<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480</id><updated>2012-02-25T01:28:09.948-08:00</updated><category term='Muslim'/><category term='नमकीन चाय'/><category term='Traffic'/><category term='Guwahati'/><category term='Blueline'/><category term='चाय'/><category term='मीडियम'/><category term='शहर'/><category term='Cities'/><category term='श्रम'/><category term='politics'/><category term='अर्थव्यस्था'/><category term='Delhi'/><category term='ब्लोग्स'/><category term='भारत'/><category term='ग्लोबल वार्मिंग'/><category term='Bhavya'/><category term='सिक्के'/><category term='Uttar Pradesh'/><category term='court'/><category term='चाय गरम चाय'/><category term='मजदूर'/><category term='Shaktipeeth'/><category term='गोरखपुर'/><category term='रेजगारी'/><category term='Law'/><category term='Ethics'/><category term='India'/><category term='Kamakhya'/><category term='Blog'/><category term='journalism'/><category term='अमिताभ बच्चन'/><category term='Media'/><title type='text'>Bhavya's World</title><subtitle type='html'>अपनी मौजूदगी से हर कोई प्रभाव छोड़ना चाहता है। मैं भी। पत्रकार हूं। पेशा भी है शौक भी। लिखना पढ़ना जारी है। और ये कोशिश भी कि लिख पढ़कर कुछ किया जा सके। मैं नहीं जानता कि पत्रकार अब कोई राह बना पाएगा या नहीं। लेकिन खुद को इतना गुमान है कि पहचान के लिए जीने से बेहतर है किसी काम के लिए जिया जाए। सो जारी हूं...</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>30</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3417603372233884992</id><published>2010-12-25T10:07:00.000-08:00</published><updated>2010-12-25T10:12:09.421-08:00</updated><title type='text'>एक रिश्ते की खोज...</title><content type='html'>लोग जाते क्यों है। ये जाना केवल जिंदगी में रिश्तों का ही नहीं होता। साथ में एक दो पल अपनेपन का अहसास देने वाले भी जब जाते हैं, तो अखरता है। शाम को जब सूरज डूबने को होता है, अंधेरा आने को होता है, तब कहीं भी किसी खुले मैदान या पार्क में खेलने वाले बच्चे इस जाते वक्त को रोक लेना चाहते हैं, वे अपने दोस्तों से अलग नहीं होना चाहते। स्कूल में आधे घंटे के इंटरवल को दिन के सबसे बेशकीमती पल बना लेने में हम कई बार सफल रहे हैं। खाली क्लास में कुछेक दोस्तों के साथ कई घंटे कब गुजरे पता ही नहीं चला। और जब प्रेम किया तो वक्त प्रेमिका की अनकही बातों में सालों की तरह बीत गया। यानि जिससे जितना जुड़ो, उतना ही वो आपके समय को तेज कर देता है। जीवन में मायने तलाशने के लिए हम ‘काम’ करते है, मतलब नौकरी। इसी के जरिए कुछ पहचान पाने की लालसा, और जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश में हम एक ही काम को हर दिन करके संतुष्टि का भाव पालते हैं। साल दर साल ये काम बढ़ता-बदलता-चलायमान ही है, हमारी पहचान से ज्यादा। लेकिन लोगों से जुड़ने की इस प्रक्रिया में आप कुछ लोगों से ज्यादा जुड़ते है और कुछ से न के बराबर। अब जरा अपने ‘वास्तविक सोच’ को आइना बनाकर किसी से न जुड़ने की वजह जब आप तलाशेंगे, तो पाएंगे कि ये केवल आपके निजी विचारों और उसके विचारों के बीच रिश्ता न बना पाने की वजह से है। काम तो आप एक जैसा करते हैं, काम के प्रति विचार भी एक जैसे रखते हैं, काम में प्रतिस्पर्धा भी समान है, काम का माहौल भी एकसा है। और हर दिन के उतार-चढ़ाव भी एक समान। पर दो लोगों के बीच सारी समझ केवल खुद के विचार से ही बनते हैं। काम से नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम लोगों को समझना नहीं चाहते। या कहें कि लोग हमें नहीं। दोनों एक ही बात है। रिश्ते बनाना दुरूह काम है। क्योंकि एक बार ये बन गए, तो इससे जुड़ी तमाम बातें इसे बरकरार रखने के लिए जरूरी हो जाती हैं। कुछ भी समझने की सबसे दिक्कत है कि इससे ही आगे निभाने या टालने का पहला प्रश्न खड़ा हो जाता है। सो हम समझदारी में टालने को वक्त के साथ ज्यादा महत्व देते जाते हैं। वैसे हम सहज संबंधों में ज्यादा आसानी पाते हैं। सो दोस्ती ही एकमात्र रिश्ता हैं, जहां दो व्यक्तित्व एक जगह-विचार-विस्तार में बिना किसी हस्तक्षेप के साथ रह सकते हैं। तो क्या सबको दोस्त बना लें। नहीं। पर हां सबसे दोस्ताना तो हुआ जा सकता है। मसलन, बीवी से उसकी सोच के अनुरूप ही व्यवहार करना व्यवहारिकता और आपकी ‘दोस्ताना समझदारी’ की मिसाल बन सकता है। और सहकर्मी के साथ बातें खुलकर कहने में मददगार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाहिर है वक्त के साथ संबंधों में जो ऊर्जा घटती है, उसे केवल आपका खुलापन ही दूर कर सकता है। स्वीकारना ही सबसे बड़ी सच्चाई है। और इससे ही नई राहें खुलती है। हम ज्यादातर अपनी सामाजिक स्वीकार्यता और पहचान को मानक बनाकर भविष्य के प्रति नींद में रहते हैं। लगता है सपनें नींद में ही अच्छे। हमारी पहचान के भी स्तरों पर हम गौर करना होगा। कुछ लोग बहुत अच्छी बात करते हैं, पर उनका जीवन सबके लिए उदाहरण नहीं होता। कुछ लोग काम में बेहतरीन होते हैं, पर वे सबके प्रिय नहीं होते। ऐसे तमाम विरोधाभास आपको अपने पास मिलते रहते हैं। पर इसके लिए कारण खुद को ‘कुछ और बनाकर’ पेश करने से पैदा होती है। जबकि आपकी सच्चाई उस स्वीकार्य सच से अलग होती है, जो परिस्थितिवश निर्मित है। असली व्यवहार वो है जिसे आप बिना किसी सोच के करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे जीवन में कई बार अच्छा या बुरा लगने का फैसला या उसे जाहिर करने का फैसला हम अगल-बगल देखकर करते हैं और एक समय के बाद ये हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। कई बार जब हम, हम होते हैं, तो इस बनावटी या ‘खुद को खो देने’ वाला व्यवहार हमें हमारा नहीं लगता। पर इसे तोड़ना हमें नहीं आता। दरअसल ये फैसला हमारे खुद के सही और गलत से जुड़ा होता है। हम ‘अपनी बनाई दुनिया’ को ही सबकी दुनिया मानते हैं। सामाजिक ताने-बाने के इस आवरण में खुद को सबसे अलग बनाए रखने के लिए हम सबके जैसे हो जाते हैं और पारस्परिक व्यवहार या प्रशंसा को खुद की पहचान का मानक मानना हमारी मजबूरी बन जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने काम के अनुभव और वास्तविक जीवन के अनुभव को आप एक पलड़े में रखकर देखने का आदी नहीं होते हैं। आपको हमेशा ये समझाया गया है कि पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ अलग-अलग रखनी चाहिए। सो आप मानते है कि आप अर्द्धनारीश्वर जैसी कोई रचना है, और कहीं कुछ और कहीं कुछ और बने रहने में ही आप सफलता के करीब हैं। खैर बदलने के लिए, या सही को सही महसूस करने के लिए निरपेक्ष होना पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों का जाना आपको इसलिए अखरता है कि क्योंकि वे या तो आपके जीवन में आपको आपका महत्व समझाने वाले होते हैं, काम में आपके लिए दोस्त, मानक स्थापित करने वाले, या बिना लाग-लपेट खुद बने रहने वाले होते है। जीवन के और रिश्तों में निभाना और बनाए रखना कई बार सामाजिक नैतिकता-अनैतिकता के दायरे में ज्यादा आता है। पर काम और दोस्ती में ये आपके खुद की दुनिया में दूसरे की बिना छेड़छाड़ किए मौजूद रहने की कला जैसा होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम आगे ही जा सकते है, पीछे नहीं। पीछे के रिश्ते, दोस्ती, संबंध दोबारा साथ आने पर भी अहसास का वो गुलदस्ता नहीं खिला सकते, जो बीते मौसम में घटा था। इसलिए किसी भी रिश्ते को वक्ती अहसास मानकर खारिज करना, खुद से दगा करने जैसा है। आप जो भी महसूस करते है, वो आपके बिताए पूरे जीवन का निचोड़ होता है। मिलना-मिलाना, निभना-निभाना, करना-करवाना जैसे शब्दों के मायने केवल आपकी सोच से बदलते हैं। सो इस बार जब कोई जाता दिखे, तो उसे रोककर खुद बनकर’ थोड़ा अपने साथ जोड़ लीजिएगा। ये ही संसार का सबसे बड़ा रिश्ता होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भव्य&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3417603372233884992?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3417603372233884992/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=3417603372233884992' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3417603372233884992'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3417603372233884992'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='एक रिश्ते की खोज...'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3164058075481228268</id><published>2010-11-02T10:53:00.000-07:00</published><updated>2010-11-02T11:03:07.186-07:00</updated><title type='text'>मांझी संग मुसाफिर...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TNBR_E_UR4I/AAAAAAAAAOQ/rBZOB9IIVJQ/s1600/bhavya.jpg"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; DISPLAY: block; HEIGHT: 300px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5535014086151260034" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TNBR_E_UR4I/AAAAAAAAAOQ/rBZOB9IIVJQ/s400/bhavya.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कहीं जहां न ओर हो न छोर हो...बस साथ में कोई मांझी भर हो...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3164058075481228268?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3164058075481228268/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=3164058075481228268' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3164058075481228268'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3164058075481228268'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/11/blog-post_02.html' title='मांझी संग मुसाफिर...'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TNBR_E_UR4I/AAAAAAAAAOQ/rBZOB9IIVJQ/s72-c/bhavya.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-8880669442347051068</id><published>2010-11-01T23:48:00.000-07:00</published><updated>2010-11-01T23:56:33.906-07:00</updated><title type='text'>सफर का तीसरा पड़ाव : कामदेव-रति की देवी</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TM-1UbttLsI/AAAAAAAAAOA/66fBRJvp4j4/s1600/rajrappa.JPG"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TM-0aTWFAFI/AAAAAAAAAN4/GAeZfYRdx3M/s1600/RajrappaTemple.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5534840831024103506" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 215px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TM-0aTWFAFI/AAAAAAAAAN4/GAeZfYRdx3M/s320/RajrappaTemple.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;रांची का एयरपोर्ट छोटा सा था। पर बाहर निकलने पर दोनों ओर की क्यारियों से मन हरा हो जाता है। सुबह की अलसाती किरणों के बीच हम झारखण्ड में थे। मंजिल थी रजरप्पा। आपे सुना है इसके बारे में। नहीं। देवी दुर्गा के दस महाविद्याओं में से एक छिन्नमस्तिका माता का रजरप्पा मंदिर रांची से 80 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले में है। रजरप्पा छोटा सा स्थान है। यहां मंदिर के अलावा दो नदियों का अनूठा संगम है, जिसके बारे में आपने कम ही सुना होगा। तो हमारी गाड़ी चल निकली। रास्ते में चाय-पानी और साथियों ने किया भरपेट नाश्ता। ये जो सफर में रूकना होता है, वो ही सबसे सुखद पलों में शुमार हो जाता है। रामगढ़ शहर से करीब 28 किमी दूर है रजरप्पा शहर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां बसी मां की छवि पत्थर की जिस शिला पर उकेरी गई है, वो कम रोशनी में साफ नहीं दिखती। मंदिर का गर्भगृह छोटा है, आस्था के इस धाम में कुछ समय पहले चोरों ने असली मूर्ति को ही गायब कर दिया और फिर बाद में एक नई मूर्ति स्थापित की गई। मां छिन्नमस्तिका का रूप थोड़ा भयावह है, उन्होने अपना ही सिर काटकर अपने हाथ में ले रखा है, और उनके धड़ से निकली खून की धारा निकलती है। खास बात ये कि माता के पैरों के नीचे कामदेव और रति मौजूद हैं। इसका अभिप्राय है कि दुनिया की शुरूआत जिस प्रेम ओर संसर्ग से हुई है, उसकी अधिष्ठात्री देवी है मां छिन्नमस्तिका।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजरप्पा में बना मां छिन्नमस्तिका का मंदिर छोटा ही है, लेकिन यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। हम नवरात्रि में यहां पहुंचे थे, चारों ओर इस देवीस्थान में भक्ति का एक अलग अहसास था। मंदिर देखने पर आपको कामाख्या के मंदिर की याद आती है, बस अंतर रंग और रोगन का है। नीले, लाल और सफेद रंगों से मंदिर को लुभावना बना दिया गया है। मंदिर निर्माण की सबसे खास बात ये है कि ये छिन्नमस्तिका यंत्र के हिसाब से ही बना है। इसका मतलब है इसके आठ मुख और चौसठ योगनियों का वास है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दामोदर और भैरवी। दो नदियां। दो रूप। और प्रकृति के सुरम्य नजारों के बीच भक्ति का पावन स्थान। जरा कल्पना कीजिए। पहाड़ी पत्थरों के बीच से उछलकूद मचाते हुए नदी की एक धारा बह रही है और आप धूप में तपते पत्थरों पर जलते पैरों को बचाते हुए, ठंडे पानी की धारा में सुकून पाते हैं। ये रजप्पा की वो छटा है, जो किसी को भी मोह ले। मंदिर के सामने ही दामोदर और भैरवी का मिलन होता है। मान्यता है कि दामोदर कामदेव का रूप हैं, और भैरवी रति देवी का। और जैसा मंदिर में मां की मूर्ति के नीचे कामदेव-रति का रूप है, वैसे ही इन नदियों का भी रूप है, मतलब कामदेव यानि दामोदर नीचे और रति या भैरवी उनके ऊपर। खैर, नदी की इस धारा के पास रहना बहुत मन भाता है। मैं तो अपनी हड़बड़ाहट में एक बार पानी में गिर भी गया। पर मजा आया। हमने नदी को महसूस किया। ये बात अलग है कि मेरे सहयोगियों के पैर लाल हो गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मंदिर के अंदर कई खास स्थान हैं, नवरात्रि भर यहां बलि का सिलसिला कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। फरसे के एक वार में बकरे की जान जाते देखना पीड़ादायक होता है। पर एक लोकमान्यता भी यहां इसे जायज ठहराती है। जिस स्थान पर बलि दी जाती है, वहां खूनमखून होने पर भी मक्खियां नहीं भिनभिनाती। इसे लोग देवी का चमत्कार मानते हैं। बलि स्थान के सामने नारियल बलि भी दी जाती है। &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt; &lt;/div&gt;&lt;div&gt;और इन दोनों स्थानों के बीच में रक्षासूत्र में पत्थर बांधकर मनौती मांगने का एक स्थान भी है। मन की मुराद पर अगर मुहर लग जाए, तो आपको यहां वापस आकर पत्थर पर नदी में बहाना पड़ता है। अरे, मैनें भी मांगी है दुआ, पूरी हुई को जाना पड़ेगा। बड़ा मुश्किल है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजरप्पा जाने के लिए आपको रांची या बोकारो जाना पड़ता है। दोनों ही शहरों से इसकी दूरी समान ही है। रजरप्पा से जुड़ी मान्यताओं में जन्मकुंडली का राहुदोष दूर होना सबसे मान्य है। कहते है यहां के दर्शन से ही आपका राहु दोष गायब। इसके अलावा यहां शादी विवाह के मौसम में बड़ी भीड़ होती है। एक मॉर्डन मान्यता भी है...नई गाड़ी की यहां पूजा कराने से गाड़ी की उम्र और परफार्मेंस बढ़ जाती है। मारुति वाले सुनो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रजरप्पा की इस यात्रा में थोड़े में बहुत कुछ मिला... आगे करेंगे वाराणसी की विशालाक्षी देवी के दर्शन। सामान उठाओं....गाड़ी से ही बनारस जाना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भव्य&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-8880669442347051068?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/8880669442347051068/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=8880669442347051068' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8880669442347051068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8880669442347051068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='सफर का तीसरा पड़ाव : कामदेव-रति की देवी'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TM-0aTWFAFI/AAAAAAAAAN4/GAeZfYRdx3M/s72-c/RajrappaTemple.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-6232535502915721178</id><published>2010-10-24T09:08:00.000-07:00</published><updated>2010-10-24T09:23:29.106-07:00</updated><title type='text'>सफर का दूसरा पड़ाव...कोलाहल में शांत काली</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMRcbJX2ppI/AAAAAAAAANw/r0yBizcOuww/s1600/new.JPG"&gt;&lt;img style="TEXT-ALIGN: center; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 240px; DISPLAY: block; HEIGHT: 320px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531647863760004754" border="0" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMRcbJX2ppI/AAAAAAAAANw/r0yBizcOuww/s320/new.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;                                                      कालीघाट और दक्षिणेश्वर, कोलकाता&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;मन को शांत कर लीजिए। गंगा और हुबली की धारा की निर्मलता को महसूस करने के लिए हम कोलकाता में थे। शहर-ए-कोलकाता, घिचपिच यातायात, तंग सड़कों और रेंगने वाली पीली, पुरानी गाड़ियों के बीच एक अलग सी संस्कृति लेकर अपनी ओर बुलाता है। मौका और दस्तूर दोनों हमारे हक में थे। बंगाली समाज का सबसे बड़ा त्योहार दुर्गापूजा के पहले दिन हम बारिश की हल्की फुहार के बीच इस महानगरी में थे। मंजिल भले ही दो मंदिर थे, पर सफर में कई और भी हसरतें थीं। मसलन, रोसोगुल्ला और संदेश का स्वाद लेने की, बारिश में किसी पुल के नीचे चाय और बिस्कुट खाने की। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;खैर, 6 अक्टूबर की शाम कोलकाता के नाम थी। होटल में सामान पटका, कुछ आफिस के काम किए, और चाय की चुस्की ली। मजा आया। रात में खाना भी खाया, किसी के घर का, अच्छा लगा, खाना भी साथ भी। सुबह इंतजार में थी....देर रात सोना और जल्दी जगना था।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;सुबह 6 बजे हम कालीघाट पर मां काली की शक्तिपीठ के सामने थे। बारिश ने हमें भिंगोने का पूरा इंतजाम किया था। हम भी इस नर्म होते मौसम में काम की ऊर्जा के साथ डटे रहे। मां काली के इस शक्तिपीठ में दर्शन को हर साल लाखों लोग आते हैं, वे मां के बड़े-बड़े नेत्रों और उनकी सोने की जीभ की आभा को नजरों में बसाने को कतारों में लगे रहते हैं। मां के रक्षक पुजारी, किसी को मूर्ति को छूने नहीं देते, लेकिन कुछ खास लोग मां के पैरों के नीचे दबे शिवजी को जरूर स्पर्श कर लेते हैं। मां काली की इस शक्तिपीठ में उनके दाएं पैर की ऊंगली गिरने की मान्यता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;बारिश ने सूरज की आहट के साथ-साथ अपना असर कम कर दिया। कालीपीठ के दाएं ओर एक कालीकुंड है, जो आस्था के साथ-साथ स्नान का एकमात्र स्थान है। पानी साफ तो नहीं, पर एक डुबकी के बाद क्या साफ, क्या मैला। यहां से मंदिर के गुंबद साफ दिखते हैं। कहा जाता है कि मां के पैर की ऊंगलियां यहीं गिरी थी, जिसे बाद में मंदिर में स्थापित करवाया गया।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मां काली के इस शक्तिपीठ में प्रवेश चार द्वार हैं, मंदिर के चारों ओर पतली संकरी गलियां है, जिनमें प्रसाद की दुकानें है, इनसे एक तरह की आवाजें आपको बुलाती है। मंदिर के अंदर बलि का भी स्थान है। कालीघाट जब जाएं, तो कोशिश करें कि किसी परिचय से ही जाए, दर्शन तो सुलभ हो जाएगा। और हां प्रसाद में लालफूल जरूर चढ़ाएं। मंदिर में दोपहर में भंडारा भी होता है, अच्छा प्रसाद मिलता है।&lt;br /&gt;मंदिर के पास ही गंगा नदी बहती हैं, यहां कभी किसी तपस्वी ने मां की घोर आराधना की थी। गंगा वैसे को कहीं साफ नहीं रह गई है, यहां आप इसे देखेंगे तो मन दुखी ही होगा। गंगा से एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए केवल 50 पैसे लगते हैं। आज भी।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;मां काली के इस घाट पर शूटिंग में आधा दिन निकल गया। अब हमें वहां जाना था, जहां की शांति ने इस शहर के कोलाहल को भुला दिया। जहां रामकृष्ण परमहंस ने एक मिथक रचा था।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दक्षिणेश्वर। गंगा के तट पर बसा एक विशाल मंदिर। तीन मंजिला, गर्भगृह में मां काली। प्रांगण में द्वादश शिव मंदिर और कृष्ण संग राधा। मानो पूरे संसार का ज्ञान और ध्यान यहां बसा है। शांत, निर्मल, पावन और अद्भुत स्थापत्य। मंदिर को आपने कई रंगों में देखा होगा। लेकिन पीली और गहरे भूरे रंग की चकत्तों वाला निर्माण देखते ही बनता है। बड़ा सुकून मिलता है यहां, तभी तो विवेकानंद को कई आगमन में यहां से वो मिला, जिसे हम आज भी जानना चाहते हैं।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;इस मंदिर को एक विधवा रानी रासमणि ने बनवाया था। कथा सच ज्यादा है, मान्यता कम। रानी बनारस जा रही थी, पूजा पाठ को, तभी एक सपने ने उन्हें रोका, और इस सपने के बाद यहां मंदिर का निर्माण शुरू हो गया। आज भी राजपरिवार के लोग यहां काम धाम देखते हैं। अब मिलते हैं हमारी संस्कृति के एक अमिट नाम से। रामकृष्ण परमहंस। एक साधक, ज्ञानी, भक्त और सर्वगुरू से।&lt;br /&gt;रानी ने जब दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया तो उन्होने यहां मां काली की एक मूर्ति लगवाई, जो बाद में उन्हे पसंद नहीं आई। तब मंदिर के पुजारी के सुझाव पर यहां मां काली की एक नई मूर्ति लगवाई गई, जो आजतक स्थापित है, ये पुजारी रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई थे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;रामकृष्ण परमहंस, जिनका असली नाम गजोधर चट्टोपाध्याय थे, बचपन से धार्मिक प्रवृत्ति के थे, को इस मंदिर में अपने बड़ा भाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद यहां का पुजारी नियुक्त किया गया। पहले वे राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी थे। लेकिन एक बाद जब उन्हे मां काली के मंदिर में पुजारी नियक्त किया गया तो कई ऐसी घटनाएं हुई, जो अब किवदंतियां और विश्वास दोनों है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;एक बार विवेकानंद परेशान होकर इसी मंदिर में चले आए, मंदिर में पुजारी थे रामकृष्ण परमहंस। पुजारी ने नरेंद्र से कहा कि जाओं मां से जो मांगना है, मांग लो। नरेंद्र तीन बार अंदर गए, और बिना मांगे वापस चले आए। तब रामकृष्ण परमहंस को इस बालक की प्रतिभा का पता चला। आगे जो हुआ, वो सबको पता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;दक्षिणेश्वर मंदिर में वैसे तो देखने को 14 चीजें है, मतलब मंदिर। लेकिन मंदिर के सामने के दलान में सुबह-शाम होने वाली आरती-कीर्तन और सत्संग में शामिल होना अद्भुत होता है। मानो किसी धारा के साथ आप न चाहते हुए भी बहते जाते हैं। और एक ज्ञान की प्राप्ति का अहसास पाते हैं। हर कही रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद समाए लगते हैं। मंदिर में वो पेड़ भी है, जिसके नीचे रामकृष्ण ने बहुत समय बिताया। और वो किनारा भी है, जहां से कल-कल बहती गंगा सीढ़ियों से लिपटते बहती है। बस कुछ क्षणों के लिए यहां बैठिए, और मन की हलचल को ठहरते देखिए।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;strong&gt;आगे हम वहां पहुंचे.......जहां कामदेव और रति के ऊपर खून की धार छोड़ती बसी हैं देवी।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;भव्य ‘नामा’&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-6232535502915721178?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/6232535502915721178/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=6232535502915721178' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6232535502915721178'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6232535502915721178'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/10/blog-post_24.html' title='सफर का दूसरा पड़ाव...कोलाहल में शांत काली'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMRcbJX2ppI/AAAAAAAAANw/r0yBizcOuww/s72-c/new.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-6293954949884612708</id><published>2010-10-23T04:26:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T04:29:16.217-07:00</updated><title type='text'>मुसाफिर हूं यारों....</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLGnB6Y_mI/AAAAAAAAANQ/bxTQwAJ8AUA/s1600/IMG00429-20101005-1234.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531201666194931298" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 300px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLGnB6Y_mI/AAAAAAAAANQ/bxTQwAJ8AUA/s400/IMG00429-20101005-1234.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt; असम के गुवाहाटी के गोपीनाथ बरदले एयरपोर्ट पर.....यात्रा के लिए मैं तैयार...&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-6293954949884612708?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/6293954949884612708/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=6293954949884612708' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6293954949884612708'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6293954949884612708'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='मुसाफिर हूं यारों....'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLGnB6Y_mI/AAAAAAAAANQ/bxTQwAJ8AUA/s72-c/IMG00429-20101005-1234.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-4507188553069742488</id><published>2010-10-22T11:12:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T04:36:11.715-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Guwahati'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Shaktipeeth'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Kamakhya'/><title type='text'>ये सिर्फ सफर नहीं है...</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLH3hvVnEI/AAAAAAAAANg/a7OzW1fJoTA/s1600/IMG00436-20101006-0603.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5531203049128041538" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLH3hvVnEI/AAAAAAAAANg/a7OzW1fJoTA/s320/IMG00436-20101006-0603.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLHd1e-qcI/AAAAAAAAANY/yWr9D9Kg5MI/s1600/IMG00436-20101006-0603.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMHd5RKUiaI/AAAAAAAAANI/P0rMvknHH0Y/s1600/SDC14679.JPG"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5530945793316653474" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 240px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMHd5RKUiaI/AAAAAAAAANI/P0rMvknHH0Y/s320/SDC14679.JPG" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;&lt;strong&gt;दुर्गा दर्शन - कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी, असम&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;लिखने के लिए लिखा जाए&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Georgia', 'serif'; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: 'Times New Roman'font-family:'Times New Roman';font-size:12;"  &gt;, &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;तो वो रचना नहीं होती।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: 'Georgia', 'serif'; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangalfont-family:'Times New Roman';font-size:12;"  &gt; &lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;उसी तरह जब घूमने के लिए यात्रा नहीं की जाती, तो वो सफर नहीं होता। लीजिए। हम तो तैयार भी नहीं थे, तारीख थी 4 अक्टूबर 2010, दिन भर के लिए शूटिंग प्लान तय था। शो भी तय था। एंकर तय थीं, दिल्ली में संवाददाताओं के जरिए दर्शकों को शक्तिपीठ के दर्शन कराने थे। मानो मां दुर्गा को ये मंजूर न था। पूरा दिन हम शूट करते रहे। शाम हो रही थी। अचानक फोन आया, और इसके बाद जो हुआ, वो अचानक, आकस्मिक और उल्लसित करने वाला था। हमें आदेश हुआ था कि हम नौ शहरों में मौजूद शक्तिपीठों पर जाकर शूट करना था।&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Georgia', 'serif'; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangalfont-family:'Times New Roman';font-size:12;"  &gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = "urn:schemas-microsoft-com:office:office" /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;चलिए। दिल्ली से सुबह 8.50 की फ्लाइट। पहला पड़ाव था गुवाहाटी, कामाख्या शक्तिपीठ। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;इस शक्तिपीठ के बारे में काफी कुछ सुना था। तंत्र साधना का महापीठ माना जाता है इसे। हम यहां शाम को 6 बजे के करीब पहुंचे। रोशनी में नहाया वो पौराणिक मंदिर एक नजर में तो केवल स्थापत्य के हिसाब से मंदिर ने पहली नजर में काफी प्रभावित किया। मंदिर के हर खंभे पर देवियों के प्रतिमाएं काफी मोहक थी। और सबसे खास था कि मुख्य मंदिर के इस ढांचे में हर कहीं सफेद कबूतरों का जमावड़ा लगा रहता है। इसे देखना काफी अच्छा लगता है। नीलांचल पहाड़ियों पर मौजूद इस मंदिर में तीन देवियां स्थापित हैं। मां सती की योनि यहां गिरने की मान्यता है। इसके अलावा दो और देवियों की शिला भी मुख्य मंदिर के गर्भगृह में मौजूद है। गर्भगृह में दर्शन में तो निराशा ज्यादा होती है, यहां दर्शन की एक कतार सुबह 5 बजे से लगी रही, 501 रूपए देने पर पंडा समाज के लोग यहां खास दर्शन करा देते हैं। ये अच्छा नहीं लगा। खैर हम भी सिफारिशी आधार पर विशेश दर्शन के अधिकारी बनें। घुप्प अंधेरे में रेंगते, कई देहों से सटते हम गर्भगृह में मां कामाख्या की उस शिला पर रखे कई किलो फूलों को छूकर हमने मां को महसूस करने की कोशिश की। इस शक्तिपीठ में कोई मूर्ति या मुखौटा नहीं है। यहां एक शिला है, जिसे अगल बगल से पानी बहता है, पानी को लेकर कई मान्यताएं है, लेकिन भौगोलिक आधार पर ये ब्रह्मपुत्र नदी का ही हो सकता है। साल में जून के महीने में मान्यता है कि मंदिर का ये जल सादा जल लाल हो जाता है, और इसे मां सती के रजस्वला होने का पर्व माना जाता है। इन पांच दिनों में मंदिर में कई सौ मीटर धोती रखकर द्वार बंद कर दिए जाते हैं। और पांच दिन बाद ये पावन कपड़ा यहां के पंडा समाज में बांट दिया जाता है, जो इसे भक्तों को निशुल्क या सशुल्क देता है। &lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;/span&gt;मुझे भी दो टुकड़े मिले, काफी मशक्कत के बाद (लेकिन मां की मर्जी कुछ र थी....ये किस्सा इलाहाबाद से जुड़ा, आगे बताउंगा)। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;कामाख्या धाम की पहली शाम काफी काफी मोहक थी, तंत्र और धारणाओं के अहसास से दूर। हम उस शाम की रोशनी में जितना काम कर सकते थे, किया। फिर आरती के क्षणों और नगाड़ों के स्वर के बीच मदहोश होने के पलों के साक्षी बनें। ये किसी भी मंदिर या धाम का वो संगीत है, जो मन से जुड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;भोर की पहली किरण के साथ हम कामाख्या में थे। वक्त कम था, पर जितनी तेजी से हम काम कर रहे थे, दिन उतनी ही थीमी गति से बढ़ रहा था। बलि की प्रथा, देखी है, कामाख्या में भैंस और बकरी की बलि किसी भी एनिमल एक्टिविस्ट को हिला कर रख दे। पर प्रथा है भइया। जारी है। &lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;गुवाहाटी शहर की सड़कें निराश करती है, जाम बहुत लगता है। इस शहर में महसूस करने को और भी कई जगहें होंगी, हम ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर एक नाव पर भी जाने का मौका लगा। इतनी चौड़ी नदी नहीं देखी थी, नदी के सीने पर बीचों बीच नीलांचल पर्वत अच्छा लगता है। &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Georgia', 'serif'; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangalfont-family:'Times New Roman';font-size:12;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;span lang="HI" style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-ascii-font-family: Georgia; mso-fareast-font-family: 'Times New Roman'font-family:Georgia;font-size:12;"  &gt;इस सफर का अगला पड़ाव कोलकाता है, जहां हमें मिलना था 'रामकृष्ण परमहंस' से....&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: 'Georgia', 'serif'; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangalfont-family:'Times New Roman';font-size:12;"  &gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p class="MsoNormal" style="MARGIN: 0in 0in 0pt; LINE-HEIGHT: normal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;&lt;strong&gt;भव्य'नामा'&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/p&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-4507188553069742488?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/4507188553069742488/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=4507188553069742488' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/4507188553069742488'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/4507188553069742488'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='ये सिर्फ सफर नहीं है...'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/TMLH3hvVnEI/AAAAAAAAANg/a7OzW1fJoTA/s72-c/IMG00436-20101006-0603.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-9034580330355561039</id><published>2010-08-17T04:08:00.000-07:00</published><updated>2010-08-17T04:37:48.302-07:00</updated><title type='text'>पीपली लाइव की पत्रकारिता का पीपल</title><content type='html'>'रण' से छिड़ी बहस 'पीपली लाइव' पर सुलग रही है। बीड़ी जलइले....के भाव में टीवी न्यूज को दिखाने वाले हमारे देसी चैनलों के सामने अपनी पत्रकारिता को समझाने की चुनौतियां अब फिल्म दे रहा है। प्रिंट पत्रकारिता यानि अखबार पर बनीं फिल्में कभी हिट नहीं हुई। 'मशाल' से लेकर 'न्यू देहली टाइम्स' तक इसे पत्रकारिता के बुनियादी सांचे-ढ़ाचे में पेश किया गया। टीवी पत्रकारिता ने अब फिल्मों में इस दिखाऊ जगत के रंग-ढ़ंग को पेश करने का मौका दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनता क्या देखना चाहती है, ये समय और काल तय करते हैं। फिल्म और टीवी में तो देखना-दिखाना, पसंद-नापसंदगी के  मानक दर्शक-बाजार की रूचि पर तय होता हैं। लेकिन पत्रकारिता के द्वंद में फंसे पत्रकारों को अपनी तस्वीर देखना भाता ही है। किसी भी टीवी पत्रकार को 'सच को सच' मानने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। यकीन मानिए,  जो दिखता है,  उसमें सबकुछ झूठ नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब पीपली... की बात करते हैं। एक गांव के किसान को जमीन नीलाम होने से बचाने के लिए एक लाख की जरूरत है, फिल्म में सबको पता है। लेकिन कायदे-कानून-सीमा-राजनीति और फायदे-नुकसान के लिए हर कोई  बेबसी झलकाता है। मीडिया का एक स्थानीय संवाददाता खबर न मिलने की सूरत में एक दिन नथ्था की आत्महत्या की बात को खबर बना देता है। बात मानवीय थी,  सच्चाई के करीब। सो खबर को नजरों में बसाने के लिए कई बड़े पत्रकार चल पड़े गांव की ओर। बीच में एक शब्द बसा है - टीआरपी। वो खबर जिसमें सबकी रूचि हो। पब्लिक इंटरेस्ट का एक अर्थ होता है - जनहित और दूसरा जनरुचि। आज का टीवी जनरूचि पर ज्यादा काम करता है। ये हम भी मानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो फिल्म में सारे सवाल उठते हैं, मजाकिया लहजों में। गालियां भी बोली जाती हैं, पर जनता के इस दर्द को कई नहीं समझता। जनता भी हॉल में हंसती ही है। फिल्म को बनाया भी कुछ इसी टोन में है। फिल्म जब खत्म होती है, तो एक पत्रकार की मौत हो जाती है। वो नथ्था के बनाएं दाक्षागृह में शहीद हो जाता है। एक पत्रकार का काम पूरा होता है। पर फिल्म में वो कई बार जलील होता है। खुद की खबर पर शहर के पत्रकारों के रवैये को देखकर गांव का पत्रकार रोता है। पर वो सही बात कहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार होना आसान है। बनें रहना मुश्किल। सच आसान है, कहना मुश्किल। फिल्म सच कहती है। अतिरेक भी करती है। फिल्म है भई। पर इसी के आधार पर टीवी पत्रकारों के जज्बे को खारिज करना जायज नहीं लगता है। बनने दीजिए दो चार फिल्में,  आने दीजिए उन्हे शोध करने के लिए कि, टीवी के पत्रकार का एक अदद दिन होता क्या है। मेरी जानकारी में अभी तक बनी टीवी पत्रकारिता पर फिल्मों में टीवी पर दिख रही प्रस्तुति को समझकर ही उसे दिखाया जाता है। लेकिन किसी असली पत्रकार के जीवन को समझने के लिए उसके साथ रहना होता है, उसके माहौल को समझना होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं किसी भी बेतुकी खबर को टीवी पर पेश करने वाले कौम से कतई सरोकार नहीं रखता है। पर इस कौम पर तोहमत लगाने से पहले इसकी खबरों में सच्चाई की ताकत से आम आदमी को साहस देने की बात को दिमाग में रखिएगा। हर नवोदित को समझदार बनने में समय लगता है। मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि - मीडियम इज द मैसेज - माध्यम ही संदेश है। टीवी का विकास एक जनसूचना देने वाले माध्यम के तौर पर हुआ था, बाद में इसमें मनोरंजन शामिल हुआ। सूचना ने समाचार का रूप लिया। अब सूचना, समाचार औऱ मनोरंजन की खिचड़ी परोसी जा रही है। लेकिन ये दौर भी बदलेगा। और एक दिन यहीं सूचना आपको अधिकार देने वाली कोशिश होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-9034580330355561039?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/9034580330355561039/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=9034580330355561039' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/9034580330355561039'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/9034580330355561039'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='पीपली लाइव की पत्रकारिता का पीपल'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-2261924933084126937</id><published>2010-06-17T09:26:00.000-07:00</published><updated>2010-06-17T09:27:39.724-07:00</updated><title type='text'>धर्म अनंता, धर्म कथा अनंता</title><content type='html'>&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;कहां से शुरू करूं। परमात्मा से या आत्मा से। शरीर से या सोच से। &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-ansi-language: EN-GB" lang="EN-GB"&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;भगवान&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;’&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt; शब्द को हिंदी में अब पांचों पंचभूत तत्वों में बांटा जा चुका है। भ से भूमि&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;,&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal; mso-bidi-theme-font: minor-bidi" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;ग से गगन&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;, &lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;व से&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal" lang="HI"&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt; &lt;/span&gt;वायु, अ से अंतरिक्ष और न से नीर। वैसे अंग्रेजी के गॉड को जेनेरेटर, ऑपरेटर और डिस्ट्रायर नाम में पहचाना जाता है। अब आप किस परम शक्ति पर विश्वास करते हैं, ये तो आप भी तय नहीं कर सकते है। पैदा भए हिंदू, तो कइसे कहे अल्लाह &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;- &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;के चोले में बंधे जो हैं। खैर, धर्म की बात करते हैं...जिससे दुनिया चल रही है। गलत कहा क्या। वैज्ञानिकों और नास्तिकों को इससे आपत्ति होगी। पर क्या करें, और कोई शब्द है क्या इस माया और मोह के लिए। धर्म अफीम है, धर्म बंधन है, धर्म सत्य का रास्ता है, धर्म ही जीवन है। ये धर्म के समर्थकों और धर्म को ज्यादा समझने वालों की बातें है। पता नहीं कौन ज्यादा सत्य है। पर एक चीज आपको माननी पड़ेगी, जो चीजें किताबों में लिख दी जाती हैं, वो किसी न किसी के लिए सत्य जरूर होती है। मेरे लिए गीता सत्य, तेरे लिए बाइबिल। हम भी लिखते हैं, अपनी बातें, किसी को सत्य समझाने के लिए। भगवान को पता नहीं मंदिर की जरूरत थी या नहीं, पर हमें छत चाहिए थी, सो भगवान को भी दे दिया मंदिर, चर्च और मस्जिद। हमें पूजा पाठ के लिए भगवान की जरूरत है, या वो हमें अपनी आराधना के लिए प्रेरित करता है। पता नहीं अंडा पहले या मुर्गी। हमारी समझ के पहले भी क्या भगवान रहा होगा। खोजना होगा। पर खोजा तो, लिखा हुआ ही जा सकता है। तो कैसे खोजे। गुफाओं में जो कलाकृतियां है, वे आज इतिहास हैं। भगवान का इतिहास। &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;?xml:namespace prefix = o ns = "urn:schemas-microsoft-com:office:office" /&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अब आज का धर्म समझते हैं। भिखारी को एक-दो रूपया, मंदिर में हाथ जोड़कर मन को लगाने की कोशिश, घर में हर दिन की पूजा पाठ के माध्यम से मन की शांति तलाशना, और ग्रहों, जन्मकुंडलियों के चक्र से उन्नति, अवनति समझना। कुछ सिमट सा गया है क्या धर्म। या कहें कि हमारा ज्ञान। बहुत जानना नहीं चाहते हम। सबकुछ तो एक स्वाइप और क्लिक पर मिल जाता है। तो क्यों दिमाग की दही करें। तो धर्म को प्रसारित करने वाले इसी सीमित दायरे में मौजूद असुरक्षा, खतरे और कम एफर्ट में तुरंत मिल जाने की चाह को बाबा, मंदिर और ज्योतिषियों के माध्यम से सीधे एक फोन काल पर दे रहे हैं। पैसे प्रश्न नहीं रह गया है। क्या लेकर आए थे, जो लेकर जाओगे। यही दे जाओं सब। &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;वैसे धर्म क्यों गढ़ा गया होगा। इंसान को नौतिकता सिखाने के लिए। अपने से साक्षात्कार कराने के लिए। लोगों को रंग के हिसाब से पहचानने के लिए। प्राकृतिक शक्तियों को समझने के लिए। या अपने वंशजों को अपने हिसाब से चलाने के लिए। पर इन सबमें वो परमात्मा नहीं नजर आता, जिसे आप खुद का हिस्सा मानते हैं। मानते हैं, आप पर निर्भर करता है। हिंदू धर्म को यत पिंडे, तत ब्रह्माण्ड – कहता आया है। मुस्लिमों को किसी भी तस्वीर या मूर्ति की आराधना इसी परम शक्ति में विश्वास के लिए ही शायद बताया गया हो, ईसाइयों तो को सुप्रीम पावर में हमेशा से यकीन रहा है। बाकी धर्मों में भी ऐसा ही है। &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अब जरा ये बताइए कि विज्ञान इन सब बातों को क्यों नहीं नकारता। वो अपनी बात को रखता है, सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधारों पर। पर बनाम में नहीं पड़ता है। भगवान हो तो ठीक, न हो तो ठीक, स्वर्ग हो तो बढ़िया, नर्क न हो तो बढ़िया। लेकिन कोशिका, न्यूट्रान-प्रोटान, बिंगबैंग, सोलर सिस्टम की बात को व्यावहारिक ढ़ंग से रखकर वो आंखे खोलता रहता है। हमारे अपने ज्ञान की। आप सब सच ही मान लेंगे, तो आगे सोचेंगे कैसे। आप सब समझ ही लेगें, तो करेंगे क्या। इसलिए भ्रम और नए शाश्वत सवालों को गढ़ा दिया गया है। मैं कौन हूं, क्यों हूं आदि। अब यदि धर्म बनाम विज्ञान की बहस में पड़ेंगे तो तर्क और कुतर्क की कई मिसाले मिलने लगेंगी। भारत में टीवी आज इस बहस को फैला रहा है। उसे लगता है 2012 में दुनिया खत्म हो जाएगी। सो लड़ाओ। वैसे एक बात जो मुझे धर्म के विषय में समझ आती है, और विज्ञान से जिसका नाता नहीं है वो है नैतिकता। समाज मे नैतिक चीजों को बताने और उसे सही तरीके से स्थापित करने में धर्म की भूमिका होती है। अब अगर पूछा जाए कि विज्ञान कैन सा नैतिक संदेश देता है। तो जवाब मुश्किल होगा। तो क्या विज्ञान विषय भर है, और धर्म विषय का आधार। आप तय करिए। &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;------&lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt;भव्य &lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="mso-bidi-language: HI; mso-bidi-font-family: Mangal"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;span style="font-family:Calibri;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;p style="MARGIN: 0in 0in 10pt" class="MsoNormal"&gt;&lt;span style="FONT-FAMILY: Mangal; mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;&lt;span style="mso-spacerun: yes"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt; &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-2261924933084126937?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/2261924933084126937/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=2261924933084126937' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2261924933084126937'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2261924933084126937'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='धर्म अनंता, धर्म कथा अनंता'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-93962106730616993</id><published>2010-05-20T21:32:00.000-07:00</published><updated>2010-05-20T21:35:47.895-07:00</updated><title type='text'>हर दिन एक नया दिन....</title><content type='html'>हमारा माहौल हमें प्रभावित करता है। आज की दुनिया में काम करना हर दिन एक चुनौती है। एक लम्बे समय से हम ये जानते हैं कि अनुशासन और नियम से जीने के फायदे है। लेकिन शरीर की थकान और मानसिक बोझ के बाद अगला दिन नया महसूस करना हमारे लिए मुश्किल सा होता है।&lt;br /&gt;मुझे बीते सालों में ये बात महसूस हुई कि अगर आप समय से नहीं जगते और सोते है तो इसका थोड़ा प्रभाव आपकी उत्पादकता पर पड़ता है। मसलन शरीर में बने रहने वाले दर्द को दूर करने के लिए आपका बार बार चाय, काफी और सिगरेट पीना। और इनमें बर्बाद होना वाला वक्त और स्वास्थ्य।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तो कैसे आपका पूरा दिन हरा भरा रहे। न दर्द हो, न चिंता।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शरीर श्वास से चलता है। और श्वास लेने की गति आपकी सारी प्रक्रियाओं को बदलती है। हम दिन भर में कभी कभी ही श्वास को शरीर के अंदर जाते और बाहर आते महसूस करते है। और इसी समय आप देख सकते है कि आप तेज सांस लेते है या धीरे। लेकिन इससे क्या। इससे बहुत कुछ। आर्ट आप लिंविंग हो या भी रिजुनवेशन प्रासेस, सभी सांस की गति से जुड़ी है। और प्राणायाम के जिस भी प्रभाव को आप सुनते है, वो सब श्वास की गति से जुड़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोजाना आफिस में हम मानसिक तौर पर एक युद्ध सा लड़ते है। हम जूझते है, दौड़ते है, खंगालते है और फिर किसी जानकारी को एक सूचना में तब्दील करते है। दिन भर इस प्रक्रिया के बाद एक थके दिमाग को आराम देत है। और ज्यादातर आपका दिमाग रात में भी दौड़ता रहता है। नतीजा अगले दिन की सुबह थकान भरी होती है। और इसके आगे पूरा दिन आपका इंतजार करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमें एक बात का खास ध्यान रखना है। सोने और जगने के लिए बनाए गए आपके नियम ज्यादातर गलत होते है। या तो आप दस से छह वाले पैटर्न पर सोते है या तो छह-आठ घण्टे वाले। इससे जुड़ा एक &lt;a title="blocked::http://www.stevepavlina.com/blog/2005/05/how-to-become-an-early-riser/" href="http://www.stevepavlina.com/blog/2005/05/how-to-become-an-early-riser/"&gt;लेख&lt;/a&gt; पाया। रोचक लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये छोटे छोटे तरीके आपके रोजाना के जीवन में भारी बदवाल ला सकते है। आजमा कर देखिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-         &lt;strong&gt;आफिस आने के समय के हिसाब से जगना छोड़कर, एक निश्चित समय जगे।&lt;br /&gt;-         इस समय का पूरा उपयोग करें। न सोचे कि आफिस जाना है तो पहले मेहनत नहीं करना।&lt;br /&gt;-         अपनी सामाजिक गतिविधि का दायरा बढ़ाते रहें।&lt;br /&gt;-         आपकी रचनात्मकता के लिए रोजाना नया जानना जरूरी है।&lt;br /&gt;-         पढ़े, खुद के लिए लिखे और रोजाना बोलचाल के लिए आपसी संवाद जरूर करें।&lt;br /&gt;-         संवाद से नई जानकारियों को बांटने में लगे रहे।    &lt;br /&gt;-         हंसने से ऊर्जा बढती है, तनाव दूर होता है। सो किसी तरह भी खुश रहें।&lt;br /&gt;-         मन को हल्का करने के लिए ब्रेक जरूर लें। ये चार घण्टे में पन्द्रह मिनट का हो सकता है।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपको सदैव ऊर्जाविंत रहने के लिए दिमाग का चुस्त रहना और शरीर का दुरूस्त रहना जरूरी है। आफिस में आप इस तरह रह सकते है वेल एंड फिट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- &lt;strong&gt;श्वास लम्बी और गहरी लें। ध्यान रखें हर श्वास में आक्सीजन शरीर के अंदर जाता है, जो माइटोकांड्रिया में जलकर ऊर्जा बनाता है और इससे जलने में रिलीज होती है कार्बन डाईआक्साइड। यहीं ऊर्जा ज्यादा बनेगी, तो आप रहेंगे ज्यादा एनर्जेटिक।&lt;br /&gt;- काम के बीच बीच में शरीर के अंगों में हरकत देते रहें। मसलन, हाथ बांधकर आगे पीछे करना, पैरों को झटका देना, गले को गोल गोल घुमाना और लम्बी सांसे लेना।&lt;br /&gt;- पानी पीने से केवल प्यास नहीं बुझती है। ये अपने आप में एनर्जी जेनेरेटर है। हर आधे धण्टे पर दो गिलास पानी जरूर पिएं। ये प्यास नहीं    शरीर की जरूरत है। एसी में प्यास नहीं लगती, लेकिन ये आदत घर से शुरू करें।&lt;br /&gt;- दो घण्टे पर एक बार पानी से मुंह जरूर धुलें। ये आपकी आंखों और चेहरे पर दिखने वाली थकान को दूर करता है।&lt;br /&gt;- मुंह धुलते समय मुंह में पानी भरकर आंखों पर छींटे मारे। इससे आपकी आंखों की रोशनी और दर्द गायब हो जाएगा।&lt;br /&gt;- ताजी हवा का कोई विकल्प नहीं। इसलिए एक दो बार उसे टहलते हुए लेना आपके लिए लाभदायी होगा।&lt;br /&gt;- कुर्सी पर बैठते वक्त अपनी कमर को सीधी ही रखें। ये पोजीशन ही आपकी कमर और रीढ़ की हड्डी का भविष्य तय करती है।&lt;br /&gt;- आंखे झपकाना न भूलें। जितनी बार आप आंख को बंद करते है आंखों में पानी की एक परत उसे धो धेती है।&lt;br /&gt;- जब भी खड़े हो, सीधे रहे, पैरों में फासला रहे और हाथ बंधे न हो। शरीर में खून के प्रवाह को बराबर करने के लिए ये जरूरी है।&lt;br /&gt;- कम्प्यूटर पर काम करने के लिए एक सादा चश्मा बनवाएं। बिना पावर का। इससे आपकी आंखो में दर्द कम होगा।&lt;br /&gt;- हेडफोन का लम्बा इस्तेमाल कान की सुनने की क्षमता को प्रभावित करता है। कानों पर इसे लगाते समय थोड़ा कानों को थोड़ा खुला रहने दें।&lt;br /&gt;- मशीनें विकिरण छोड़ती है, सो खाली समय में थोडी दूरी जरूरी है।&lt;br /&gt;- मोबाइल को शरीर से दूर ही रखें। आप इसे अपने सामने रख सकते है।&lt;br /&gt;- मोबाइल पर हेडफोन से बात करें। कम नुकसान होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;ऐसे बहत से तरीके है जिनसे हम अपने आस पास के माहौल और खुद को बदल सकते है। ये कुछ थे। अपने आस पास का हरियाली को अगर हम खुद में महसूस करते है तो हम हमेशा तरोताजा रहते है। और इसके लिए केवल थोड़ी सतर्कता और ध्यान ही चाहिए होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भव्य&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-93962106730616993?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/93962106730616993/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=93962106730616993' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/93962106730616993'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/93962106730616993'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='हर दिन एक नया दिन....'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-8929023125181267733</id><published>2008-08-17T10:03:00.000-07:00</published><updated>2008-08-17T10:10:18.753-07:00</updated><title type='text'>हे भारतमाता!</title><content type='html'>&lt;strong&gt;हे भारतमाता। &lt;br /&gt;अजर, अमर, अटल देश हो, हे भाग्यविधाता &lt;br /&gt;खिले हर कोख में एक दूर दृष्टिदाता &lt;br /&gt;प्रेम, माधुर्य, भाईचारे बनी रहे ये अविरल गाथा &lt;br /&gt;हे भारत माता हे भारत माता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बनी पड़ी मिसाल है, अखंड कथा निहाल है। &lt;br /&gt;धरा पर बिखरा तेज है, ये संस्कृति की सेज है। &lt;br /&gt;नदी की धार सार है, यहां भूमि आधार है। &lt;br /&gt;हर नजर में स्वप्न है, कर्म यहां धर्म है। &lt;br /&gt;हर बात में दर्शन है, हर साथ में समर्पण है। &lt;br /&gt;हर ओर छाया उजाला है, हर पंथ यहां निराला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आशाओं के विस्तार में व्यक्ति की पहचान है। &lt;br /&gt;इस देश की बात में हर अर्थ बस महान है। &lt;br /&gt;जन मन गण, भारत भाग्य विधाता &lt;br /&gt;हे भारत माता, हे भारत माता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक राह का सफर, चल रहे कई डगर। &lt;br /&gt;एक चाह का नगर, खोज रहे सभी मगर। &lt;br /&gt;एक धर्म का चौराहा, हर किसी के लिए दोराहा। &lt;br /&gt;एक जीवन का सत्य, न मिले तो लगे सूर्य अस्त। &lt;br /&gt;एक सच का रहे भान, देश के साथ मिलें है प्राण। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक भूमिका रहे हमेशा, छोड़ जाएं कुछ अनोखा। &lt;br /&gt;दो इस बात का वरदान, रहे हमें देशभक्ति का भान। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हे भारत माता। हे भारत माता। हे भारत माता।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-8929023125181267733?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/8929023125181267733/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=8929023125181267733' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8929023125181267733'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8929023125181267733'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='हे भारतमाता!'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-2761848519419718585</id><published>2008-05-20T06:39:00.000-07:00</published><updated>2008-05-20T06:40:48.470-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मीडियम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्लोग्स'/><title type='text'>ब्लागों का कट-कापी-पेस्ट</title><content type='html'>बहुत दिनों से ब्लागों की दुनिया से दूरी रही। पता नहीं क्यो। मन नहीं करता था कि किसी एग्रीगेटर पर जाकर तलाशूं कि क्या पढ़ू, क्या छोड़ू। ये अजीब सा समय है। सुबह अखबार की खबरों से लेकर टीवी समाचार तक पसरी सूचनाओं की भीड़ में खुद को तलाशना कठिन है। अखबारों के पन्ने ज्यादा होते है। वजन ही पचास से सौ ग्राम होता है। अपितु हिंदी अखबारों के पन्ने हल्के होने लगे है। टीवी पर दौ सौ चैनलों में समरूपता हावी है। खबरें, फिल्में, सीरीयल्स सब एक ही पन्नी में लपेटे लगते है। ब्लाग पर लेखन से एक विविधता के दर्शन होते थे। लेकिन क्लिकर्स की भीड़ खींचने के लिए यहां भी लेख, कविता, विश्लेषण के नामों को लेकर एक्सक्सूजिविटी दिखने लगी है। ये बीमारी है। हर कोई भीड़ खींचने के लिए अनोखे, विडंबना भरे शीर्षकों को चेप रहा है। ये कट कापी पेस्ट जैसा लगता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लाग की ताकत भाषा है। यानि कि वो आधार जिसके बल पर उसे रचा जा रहा है। हिंदी एक व्यावसायिक भाषा नहीं है। इसका अंदाजा साहित्यधर्मियों से लेकर आईटी प्रबंधकों को बेहतर है। आज ही पढ़ा कि देश में पांच करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है। इनमें से चार करोड़ शहर में, नब्बे लाख गांवों में। इसी सर्वेक्षण में था कि अंग्रेजी के इस्तेमाल में इसमें 23 से 49 फीसदी लोग जुटे है। यानि कि इंटरनेट की भाषा है अंग्रेजी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी भाषा में जो ब्लाग अति लोकप्रिय रहे, वो किसी न किसी माहौल के कारण जाने जाते रहे। चाहे चीन की एक अभिनेत्री का ब्लाग हो या अफ्गानिस्तान के एक भुक्तभोगी का ब्लाग। इनमें रहस्य और प्रस्तुति के पूरे साजोसामान थे। और था मानव उत्सुकता का इंतजाम। ये बात अभी तक हिंदी ब्लागरों में नजर नहीं आती। वो किसी प्रकार से विश्व को कुछ अनोखा नहीं बता रहे है। मैं रामचरितमानस, और अपने प्राचीन वांग्मय के लिए हिंदी ब्लागरों को साधुवाद देता हूं। लेकिन क्या तकनीकी के इस्तेमाल से उन्हे आडियो प्रस्तुति के लिए तैयार करने की जरूरत पर जल्द से जल्द विचार नहीं होना चाहिए। जिससे वो पढ़ने की जहमत के बचने वालों के लिए भी लुभावने हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज भी हम इंटरनेट को नया अनोखा, तात्कालिक शोध, खोज और व्यक्तिगत सूचना के लिए ही ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है। ऐसे समय में जब समय देने के लिए एक मूल्य चुकाना पड़े, तो किसी का सामान्य लिखा पढ़ना समय और पैसे दोनों की फिजूलखर्ची सरीखा होगा। ये ध्यान रखें कि मध्यमवर्गीय शहरों में साइबर कैफे पर वक्त बिताने वाला युवक चाहता है अनोखा और मनोरंजक। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ट्रेंड का पीछा करके बीते वक्त में कई अनुत्पादक ब्लगों की एक झड़ी सी देखने को मिलती है। मीडिया की कलई खोलते, अपनी मन की पुकार वाली कविताएं, कई समस्याओं पर बहुकेन्द्रित ब्लाग, अनावश्यक सूचनाओं वाले ब्लाग, ऐसे तमाम प्रयासों की सचाई है कि वे आज भी तलाश रहे है पाठक। पाठक की रूचि को भांपना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। सभी माध्यमों के लिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जारी रहूंगा....      &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'भव्य'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-2761848519419718585?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/2761848519419718585/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=2761848519419718585' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2761848519419718585'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2761848519419718585'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2008/05/blog-post.html' title='ब्लागों का कट-कापी-पेस्ट'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-1469244161484904338</id><published>2008-01-11T07:26:00.000-08:00</published><updated>2010-05-20T21:27:56.087-07:00</updated><title type='text'>"क्या खुद को जानना है"?</title><content type='html'>अपने को जानने समझने के लिए अब तक भारतीय परंपरा में ध्यान ही सबसे बड़े माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के सालों में बाजार में आ गई है स्व-विकास, स्व- मूल्यांकन और लाइफ और प्रोफेशनल मैनेजमैंट की हजारों किताबें। तो क्या है इन किताबों में, जो दिखा रहा है हर सफल-असफल इंसान को एक सपना। थोड़ा पीछे चलना होगा। व्यक्ति को उसके व्यवहार में कुशल और आसपास ज्यादा चर्चा दिलाने के लिए 1937 में &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dale_Carnegie"&gt;डेल कार्नेगी&lt;/a&gt; ने लिखी एक किताब। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/How_to_Win_Friends_and_Influence_People"&gt;हाऊ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लूएंस पीपुल्स। &lt;/a&gt;इस किताब को पढ़कर आप ये जानेंगे कि कुछ चीजों को अपनाकर आप कैसे जीततें है अपने का मन। और कुछ चीजों को बरत कर आप हो जाते है चर्चित।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये तो महज एक शुरूआत थी। इस किताब की अपार सफलता के बाद, तो मानो इंसान की सबसे बड़ी ललक को भुनाने के लिए छपीं थड़ाथड़ किताबें। वैसे पश्चिमी देशो में लोगों को अमीर बनाने वाली नेपेलियन हिल और स्वेट मार्टिन की किताबें मौजूद थी। लेकिन इंसान को अमीर बनाने की चाहत को भुनाने की इस कड़ी के बाद जोर व्यक्तित्व विकास को बेहतर बनाने पर रहा। भारत में इसे लेकर जो चर्चा छिड़ी, वो &lt;a href="http://www.blonnet.com/2001/11/12/stories/211209dm.htm"&gt;यू कैन विन&lt;/a&gt; से परवान चढ़ी। इस किताब में सैकड़ों किस्से थे, जो इंसान की क्षमता और चाहत के बीच एक पुल बना रहे थे। इसने वो कर दिखाया, जो तब वक्त की जरूरत थी। यानि कि जागरूकता। अपने अंदर छुपे गुणों की। उनको खोजने की। और ये एक हद तक नैतिक ज्यादा रही।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये खोज ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। किताब में किस्सागो बेहतर था, लेकिन आज के युवा और व्यस्त भारत ने इसे पढ़कर किनारे रख दिया। नैतिकता से क्षमता के नाते को समझाने में ये किताब नाकामाब रही। मैनेजमेंट शायद सबसे बड़ी रूकावट थी। हर कहीं ऐसा कारीगरों, या कहें कि प्रोफेशनल्स की जरूरत थी, जो प्रबंधन कर सकें। लेकिन भारतीय विकसित कामगारों के पास निजी जीवन से व्यवसायिक जीवन तक किसी तरह का खास प्रबंधन नहीं था। वे अनुशासित या अनुशासित तो थे, पर विचारों की गढ़ी-पढ़ी श्रंख्ला से कैद नहीं। वे नियम बनाने में यकीन तो रखते है, लेकिन जरूरत पर उन्हे तोड़ने में गुरेज नहीं करते। सो अमीर बनाने के ख्वाब, नैतिकता के क्षमतावान सबक, सब पीछे छूटे रह गए। नया मंत्र था मैनेजमेंट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर संभव कोशिश की बड़े पदों पर बैठे, प्रबंधन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों और पालिसी के क्रियांवित करवने वालों ने। इस तरह की किताब छापी जाए कि वो किसी तरह माहौल को बनाए। एक ऐसा माहौल जो अपने आप कारीगर पैदा कर दे। कठिन सोच। लेकिन &lt;a href="http://harvardbusinessonline.hbsp.harvard.edu/hbsp/index.jsp;jsessionid=OH3GX3GINGIE2AKRGWDR5VQBKE0YIISW?_requestid=14179"&gt;हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू &lt;/a&gt;&lt;a href="http://www.gallup.com/"&gt;गैलप&lt;/a&gt; जैसी तमाम बड़ी शोध संस्थओं ने समय समय पर शोध के बाद मैनेजमेंट से जुड़ा अपने अपने निष्कर्ष दिए। ये कहीं न कहीं किसी एजेंडा को फैलाने या एक निजी शोध के बखाने वाले रहे। मैनेडमेंट के जमीनी सिद्धांतों को या तो किसी कंपनी की सफलता के बाद या किसी नई कंपनी में किसी फार्मूले को अपनाने के बाद कारगर माना जाता है। तो ऐसे में किसी नए उद्यमी के लिए इनके बल पर निवेश की कोशिश हमेशा से कमजोर दांव मानी गई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैनेजमैंट के खिलाड़ी इसे तोड़ तोड़ कर हर अंग को पेश करने लगे। अंग। यानि स्ट्रक्टर, इंफ्रास्ट्रक्टर, ह्यूमन रिसोर्स, वर्किंग एनवायरमेंट, पालिसी, और किसी भी कंपनी की रीढ़ यानि कि इम्प्लाई के स्ट्रेंथ को बढ़ाने के फार्मूले। आज जिस चीज पर सबसे ज्यादा फोकस है वो है आपकी क्षमता। इसके लिए ये जरूरी है कि आप जानें कि आप में क्या क्या गुण है, आप की अच्छाईयां और बुराईयां क्या है। और क्या आप अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर पा रहे हैं। इसके लिए बीते सालों में कई किताबें छपी। लेकिन जिस सीरीज को &lt;a href="http://www.economist.com/"&gt;द इकानामिस्ट&lt;/a&gt; ने भी सबसे बेहतरीन माना है, वो है गैलप के साथ &lt;a href="https://www.strengthsfinder.com/"&gt;स्ट्रेंथ फाइंडर&lt;/a&gt; की। इस सीरिज के तहत बाजार में छह किताबें उतर चुकी है। और अगर गौर करें तो इनमें सबसे ज्यादा प्रभावी रही &lt;a href="http://www.marcusbuckingham.com/books/discover-strengths.php"&gt;नाऊ डिस्कवर योर स्ट्रेंथ&lt;/a&gt;। मार्कस बकिंघम की इस किताब में वो सब लिखा है, जिसका आपको निजी और व्यवसायिक जीवन में काम पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन क्या पढ़ कर और कभी कभी उसे अपनाकर आप सफल हो सकते है। ये इसपर भी निर्भर करता है कि सफलता आपके लिए क्या मायने रखती है। कभी कभी पद या पैसा वो सब नहीं देता, जो मन का काम करना देता है। ज्यादा जरूरी है कि आप ये जाने कि आप कैसे वयक्ति है। इसके लिए तमामा शोध हुए। जिस एक &lt;a href="http://www.authentichappiness.sas.upenn.edu/Default.aspx"&gt;शोध को आप अपना सकते है&lt;/a&gt;, वो किया है यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया ने। आथेंटिक हैपिनस सिरीज के तहत इसे नाम दिया गया &lt;a href="http://www.authentichappiness.sas.upenn.edu/Default.aspx"&gt;वाया सिग्नेचर स्ट्रेंथ क्वेश्चनेयर&lt;/a&gt;। आप यहां पर जाकर, अपने आप को एनराल कराकर पा सकते है वो चौबीस गुण, जो 240 सवाल के मल्टिपल जबाव के बाद आता है। ये मानक तो हो ही सकता है। दरअसल कई सालों के बाद की रिसर्च के बाद ये सवाल आपको ये बता पाने में सफल होते है कि आपके पांच प्रभावी गुण क्या है और इक्कीस अन्य गुण।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर। खुद को मानसिक और व्यावहारिक तौर पर संवारने की इस कवायद में हम आप न भी लगे हो, तो भी खुश रह सकते है। क्योंकि किसी न किसी तौर पर हम आप करते वहीं है, जो हमें थोड़ा बहुत संतुष्टि देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भव्य &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;foryou2005@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-1469244161484904338?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/1469244161484904338/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=1469244161484904338' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/1469244161484904338'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/1469244161484904338'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='&quot;क्या खुद को जानना है&quot;?'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-8458026259667442214</id><published>2007-08-23T06:00:00.000-07:00</published><updated>2008-12-08T13:39:03.511-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Media'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Law'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Ethics'/><title type='text'>A chapter on Media Law &amp; Ethics.</title><content type='html'>Hello, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Big things happen rarely! It’s a big achievement for me to be on paper! I wrote a “chapter on electronic media ethical issues” and it got published in a book, it’s a dream come true for me……I share the Preface and Content with u all….Need your insights for a future, which is very dedicated to electronic media.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Bhavya&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://cyberjournalist.org.in/medialaw.html&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;http://bhavyakiduniya.blogspot.com/&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Books&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rs2FskNPcxI/AAAAAAAAABc/HYiLpbWgGe0/s1600-h/media+law.bmp"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rs2FskNPcxI/AAAAAAAAABc/HYiLpbWgGe0/s200/media+law.bmp" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5101880953560593170" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Media Law and Ethics: Readings in Communication Regulation&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Edited by&lt;br /&gt;Kiran Prasad&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2007; ISBN 81-7646-604-2; Pp xxviii + 457; Rs. 1200 (HB)&lt;br /&gt;B.R. Publishing Corporation, BRPC (India) Ltd,4737 A/23, Main Ansari Road,   Darya Ganj, New Delhi – 110002.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;There are many books on media law and communication ethics, but today journalism and communication studies are being transformed by new media and communication convergence. This book tries to unravel the complication&lt;br /&gt;and updates the curriculum on communication regulations. This book is designed keeping in mind the UGC Core Curriculum for the course Media Law and Ethics offered at the Masters Degree for students of Journalism, Mass Communication, Electronic Media, Public Relations and Advertising Studies in the Indian Universities. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Every journalist and journalism student - from the traditional print media to the modern convergent media - should know the legal and ethical aspects of publishing a story. There are two main aspects of media regulations: 1) media laws about the publication of a story which may relate to libel and defamation; and 2) media laws about permissible comments on legal proceedings which include contempt of court. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;A journalist must also make ethical choices about each story apart from  its possible legal implications. This book examines not only the laws governing the media but also ethical issues in everyday journalism. The chapters in the book have focused on the existing challenges in communication regulations and also throw light on the emerging ethical concerns in the global media environment.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;BACK Home       &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Content&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Preface&lt;br /&gt;Editor and Contributors&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Theoretical Foundations of Communication Regulations&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.    Freedom, Regulation and Ethics: Market, State and Media Accountability System - Claude-Jean Bertrand &lt;br /&gt;2.    Communication and Values - Kiran Prasad&lt;br /&gt;3.    A Theory of Media Ethics: Foundation and Key Issues - Kiran Prasad&lt;br /&gt;4.    Satellite Broadcasting Regulation and Cultural Exception: An Arab Islamic View of Communication &lt;br /&gt;- Basyouni Ibrahim Hamada&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Press and Broadcasting Regulations&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.    Laws and Regulations Governing Press Freedom in India&lt;br /&gt;- P. E. Thomas&lt;br /&gt;6.    Laws and Regulations in Indian Broadcasting&lt;br /&gt;- G. Nagamallika&lt;br /&gt;7.    Foreign Direct Investment in Print Media: Legal and Ethical Issues –&lt;br /&gt;- Roy Mathew &lt;br /&gt;8.    Freedom, Individualism and Ethical Behaviour:  A Comparative Study of Print and Electronic Media Journalists &lt;br /&gt;-  Kiran Prasad&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;9.    Electronic News Media and Emerging Ethical Issues -&lt;a href="http://foryou2005.googlepages.com/"&gt;Bhavya Srivastava &lt;/a&lt;a href="http://foryou2005.googlepages.com/"&gt;&gt;(http://foryou2005.googlepages.com/)&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;New Media and Content Regulations&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10.    The Legal Capture of New Media Technology&lt;br /&gt;- Lawrence Liang&lt;br /&gt;11.    Indian Cyber Laws&lt;br /&gt;- Umesh Arya&lt;br /&gt;12.    Cyber Journalism: Legal and Ethical Issues&lt;br /&gt;- Pradeep Nair&lt;br /&gt;13.    All Rights Reserved?: Cultural Monopoly and the Troubles with Copyright in the Age of the Internet &lt;br /&gt;- Michael Geist &lt;br /&gt;14.    Pornography and Women’s Sexuality in the Legal Web &lt;br /&gt;- Kamayani Bali Mahabal &lt;br /&gt;15.    Protecting Minors against Harmful New Media Content: Perspectives on Content Regulation in the Digital Media &lt;br /&gt;- Eva Lievens&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Regulations in Functional Communication&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16.    Emergency and Censorship: The dark side of Indian Democracy&lt;br /&gt;- Shaju P.P&lt;br /&gt;17.    Media and Legislative Privileges: A Case Study&lt;br /&gt;- Nirmaldasan&lt;br /&gt;18.    Regulatory Challenges and Ethical Issues in Public Relations and Advertising &lt;br /&gt;- Waheeda Sultana &lt;br /&gt;19.    Right to Information and Communication Regulations in India &lt;br /&gt;- Kiran Prasad&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;About the Editor: Kiran Prasad is Associate Professor in Communication and Journalism, Sri Padmavati Mahila University, Tirupati, India. Recently she was awarded the Commonwealth Academic Staff Fellowship and was Visiting Research Fellow at the Institute of Communication Studies, University of Leeds, UK. She was Canadian Studies Research Fellow at the School of Journalism and Communication, Carleton University, Ottawa, Canada. She is also the youngest ever recipient of the ‘State Best Teacher Award’ for university teachers from the Government of Andhra Pradesh, India. A prolific writer and well known Indian communication philosopher, she is author/editor of over fifteen books. Her theoretical contributions include a conceptual model of Ethics Affecting Variables (EAV) in Communication; an analytical framework and conceptual model on Media Policy Affecting Variables for the implementation of media policy in the developing countries; and a conceptual model on Voting Behaviour Affecting Variables in Political Communication Campaign. She has specialized in several branches of communication and has successfully guided doctoral degrees in communication and journalism. She can be reached at  kiranrn_prasad@hotmail.com; kiranrn.prasad@gmail.com&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;Also from the same author: Information and Communication Technology-Recasting Development&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-8458026259667442214?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/8458026259667442214/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=8458026259667442214' title='40 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8458026259667442214'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/8458026259667442214'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/08/chapter-on-media-law-ethics.html' title='A chapter on Media Law &amp; Ethics.'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rs2FskNPcxI/AAAAAAAAABc/HYiLpbWgGe0/s72-c/media+law.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>40</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3575541806401364432</id><published>2007-08-22T06:00:00.000-07:00</published><updated>2007-08-22T06:02:49.537-07:00</updated><title type='text'>नगर नगर एक सफर - भाग 2</title><content type='html'>अलीगढ़ में रूकना कुछ ही घण्टे रहा। सो जानने समझने का पूरा वक्त मिल नहीं पाया ।आगे एक ऐसे शहर को जाना था, जहां रेल नहीं जाती है। मैं पूर्वोत्तर राज्यों या जम्मूकश्मीर में नहीं, अपने राज्य उत्तर प्रदेश के एक नगर की बात बता रहा हूं, जहां रेल नहीं जाती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एटा। एक ऐसा शहर जिसके बारे में आप किसी भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाशिंदे से पूछेंगे तो वो कहेगा, हां एटा, वो तो इटावा के पास है कहीं। जैसे शहर का दूसरा मोहल्ला हो। लेकिन वो ये भी बताने में सक्षम नहीं होगा कि इटावा कहां है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एटा, जिला है। जो आगरा डिवीजन में आता है। इसके उत्तर में बदायूं, पश्चिम में अलीगढ़, हाथरस, मशुरा और आगरा, दक्षिण में मैनपुरी और फिरोजाबाद और पूर्व में फर्रूखाबाद बसा है। तो मैं एटा जा रहा था, पश्चिम में बसे अलीगढ़ से। यहां से एटा जाने के लिए कई साधन थे। सभी सड़को पर चलने वाले। जाहिर है एक जागरूक नागरिक के तौर पर मैने सरकारी बस को ही चुना। क्योंकि दस बीस मिनट की जल्दी के लिए मैं किसी जीप या गाड़ी में दब कुचलकर सौ की गति से उड़ते वाहन में बैठने का जोखिम नहीं लेना चाहता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस ड्राइवर के पीछे की सीट पर बैठा। और गाड़ी ने गति पकड़ी। रोड़ काफी खराब थी। लेकिन मन खिड़की से आती हवा के साथ बहने लगा। रास्ते में एक ढाबे पर बस रूकी। अनाधिकृत तौर पर। पर ये चलता है साहब। आप भारत में सुविधा से ज्यादा चलने को तरजीह देते है। सो हम उतरे। लघुशंका आदि के बाद जो चाय सुड़की गई, वो भारत में बनी बढ़िया चाय को मात देती मालूम होती थी। चाय पीने का शौक है। सो दो गिलास पी ली। केवल चार रूपए में। वैसे दिल्ली की सैकडों की चाय भी अब मंहगी नहीं लगती। शौक जो है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस चली। ग्रांड ट्रंक रोड। जिसे शेरशाह सूरी ने बनावाया। सोलहवीं शताब्दी में बनी एक विशाल पथ। जो बंगाल के सोनारगांव से आगरा के सासाराम तक बनी थी। शेरसाह सूरी के गुजर जाने के बाद इसका विस्तार हुआ। आज ग्रांड ट्रंक रोड ढाई हजार किलोमीटर की दूरी पर पसरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर जिस ग्रांड ट्रंक रोड पर ये बस गुजर रही थी, वो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से गुजर रही थी। यानि कि इसे भी इसका गुमान होना ही था। सो बड़े गड्ढ़ो, सड़क हिचकोले खाती बस में हमें रास्ते का अहसास हो गया। बेहद ही खराब थी ये सत्तर किलोमीटर का रास्ता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर एटा पहुंचा। एटा में छह तहसीलें है। तहसील यानि जिले को प्रशासनिक तौर पर नियंत्रित करने के लिए एक ईकाई। हर तहसील का एक प्रशासनिक प्रभारी होता है, जो राज्य लोकसेवा आयोग से चुना जाता है। जिसे उत्तर प्रदेश में पीसीएस कहते है। वो तहसील का प्रशासनिक काम देखता है और उपजिलाधिकारी होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एटा में जो सबसे प्रचलित शब्द है, वो है पकड़। यानि माल जब्त करना नहीं। बल्कि आपका अपहरण। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में अपराध ज्यादा है। वजह जमीन और राजनौतिक हस्तियों की दखल है। मैने एक जानने वाले से जाना कि पकड़ की कीमत क्या है। यानि फिरौती का हिसाब क्या है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चौंकिएगा नहीं। क्योंकि ये आपके जीडीपी या पर कैपिटा इनकम से नहीं समझ आएगा। आपको इसके लिए देश के गांवों में जाकर एक समय का राशन खरीद कर खाना होगा। या शहर में दिहाड़ी पर जीते लोगों का जीवन समझना होगा। पकड़ एटा में आए दिन का बात है और पकड़ से छूटने की कीमत भी आम दिन की जद्दोदजहद के बराबर। यानि किसी पकड़ की कीमत दो हजार है तो किसी की एक साइकिल या भैंस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ये काफी है देश के हालात को समझने के लिए। जहां मुबई में एक जवान की मौत के पीछे दो करोड़ की फिरौती की बात है तो, भारत के एक जिले में उसकी जान की कीमत है मात्र दो हजार रूपए। ये असंतुलन बताता है कि देश में दरार कितनी बड़ी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं एटा दो दिन रहा। निजी काम था। हो गया। आगे का सफर करना था। आगरा पहुंचना था। आगरा गए सालों हो गए थे। ताजमहल को देखने की तमन्ना थी। सो रहिएगा साथ। दिखाता हूं आपको ताज का एक नया चेहरा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3575541806401364432?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3575541806401364432/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=3575541806401364432' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3575541806401364432'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3575541806401364432'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/08/2.html' title='नगर नगर एक सफर - भाग 2'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-6718880568451623992</id><published>2007-08-17T08:50:00.000-07:00</published><updated>2007-08-17T08:52:49.835-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='India'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Uttar Pradesh'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Cities'/><title type='text'>नगर नगर एक सफर....</title><content type='html'>बीते दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ शहरों में जाना हुआ। खासकर आगरा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले उतनी ही दूरी पर बसते है जितनी दूरी पर द्वारका से आनंदविहार या कल्याण से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल आने में लगते है। यानि एक घण्टे में एक जिले में तो दूसरे घण्टे में दूसरे जिले में। शुरूआत अलीगढ़ से हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह के चार बजे है। दिन पंद्रह अगस्त। मैं अलीगढ़ में हूं। ये शहर अपनी संजीदगी और सरगोशी के लिए पहचाना जाता है। यहां के माहौल में तनाव बना रहता है। कुछ बना बनाया तनाव। लेकिन अलस्सुबह आजादी की साठवीं वर्षगांठ पर शहर की सड़को पर एक परछाई थी। ज्यादातर घरों, दुकानों पर झालर लटकी थी। जिससे चकमक चकमक रोशनी सड़को पर उजाला और अंधेरा कर रही थी। अलीगढ़ के स्वभाव की तरह। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह सुबह मुझे जो दिखा, वो हर छोटे शहर में सुबह देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के बाहर जिंदगी जिंदा थी। चाय पी कर आगे बढ़ा। तो देखा कि दिन की ही तरह हर निकलने वाले को अपनी ओर खींचने वाले रिक्शेचालक पूछ रहे थे कि कहां जाएंगे। मन खट्टा हो चला है। क्या हर शहर में पता होना जरूरी है। मेरा सफर लम्बा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बाहर आकर, रिक्शों वालों को छोड़ता हुआ। पैदल ही बढ़ गया। रेलवे स्टेशन के आगे से बाई तरफ जाकर मैं चलता गया। सड़को सूनसान थी। मकानों, दुकानों पर सजे झालर रोशनी की आंखमिचौली खेल रहे थे। मैं भी आंख ही मिचमिचा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा अलीगढ़ के बारे में हमेशा सुनता आया था, उससे अलग अहसास हो रहा था। शांत और सुकून भरा। आज के दिन का अहसास भी माहौल को अलह बना रहा था। पन्द्रह अगस्त। देश को आजाद हुए आज साठ साल हो गए। और अगर इस चीज को समझना हो तो अलीगढ़ से बेहतर क्या होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिन आगे था। मेरे पास केवल कुछ समय था, शहर समझने को। एक खुलती दुकान पर बैठकर मैने चाय की इच्छा जताई। उसने कसमसाते हुए कहा कि थोड़ी देर लगेगी। मैने कहां कोई बात नहीं। बैठा रहा। फिर चाय वाले ने कहां कहां से आए है। मेरे हाथ में बैग था। और भारत में ये यात्री होने की पहचान है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात आगे बढ़ी। पता चला कि चायवाला अलीगढ़ की मूल निवासी है। पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। अलीगढ़ के इतिहास से लेकर आज तक सब बताया। मैने पाया कि भले ही इस शहर में सांप्रदायिक तनाव रह रह कर आता जाता रहता हो, लेकिन सदभाव की मिसाल इस शहर ने भी कायम कर रखी है। राजनैतिक तौर पर तो ये साफ दिखता है। अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में से छह पर हिंदू प्रतिनिधि चुने गए है। जिनमें से दो तो भाजपा है। ये अलग बात है कि शहर की कमान समाजवादी पार्टी के पास है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाय पक चुकी थी। छानी जा रही थी। तलब बढ़ गई थी। अमर उजाला अखबार आ चुका था। देश की आजादी की साठवीं वर्षगांठ की खबरें थी। लोकल पन्नों में हिंसा भी खबरों में थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरा सफर आगे बढ़ना था। सो इस शहर में मेरा समय पूरा हो चुका था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे जारी रहेगा....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-6718880568451623992?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/6718880568451623992/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=6718880568451623992' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6718880568451623992'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6718880568451623992'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/08/blog-post.html' title='नगर नगर एक सफर....'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-4867331211041585679</id><published>2007-07-03T06:55:00.000-07:00</published><updated>2008-12-08T13:39:03.708-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Delhi'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Traffic'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Blueline'/><title type='text'>नीली पीली बसों का खौफ</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/RopV41Y4sCI/AAAAAAAAAA8/-2hOfYt_uPY/s1600-h/Buses-Delhi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/RopV41Y4sCI/AAAAAAAAAA8/-2hOfYt_uPY/s200/Buses-Delhi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5082969564333518882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में चलना है तो सभंलना जरूरी है। और अगर सड़क पर किसी ब्लूलाइन बस के आस पास है तो दूरी जरूरी है। सरकार भी दूरी के फार्मूले को अपना रही है। आज ही दिल्ली सरकार की मुखिया ने कहा कि धीरे धीरे सड़कों पर से साढ़े चार हजार ब्लू लाइन बसों को हटा दिया जाएगा। तो मुसाफिर चलेंगे कैसे। इसके लिए होंगी। हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों को इनकी जगह लगाया जाएगा। तो यानि दिल्ली को इस रौंदती आफत से निजात दिलाने के लिए करोड़ो खर्च होंगे।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों ब्लू लाइन बस वाले नहीं मानते कि उनसे ऊपर सड़क पर कोई है। क्यों वे एक चक्कर को कम समय में पूरा करना चाहते है। इस देश में करोड़ों लोगों को दिल्ली की इस खतरनाक पीली नीली बस में सफर करने का मौका नहीं मिला होगा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;दरअसल सड़को पर नम्बर रूटों से दौड़ने वाली ब्लू लाइन बसों को एक दिन में चार से पांच चक्कर लगाने की अनुमति होती है। लेकिन इससे न तो रोजाना का खर्चा निकलता है और न ही थानों में दी जाने वाला सुविधा शुल्क।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन हजार बसें रोजाना लाखों लोग को दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाती, ले आती है। इनका किराया भी दो, पांच सात और दस रूपए। एक ऐसे शहर में जहां रहने के लिए मकान हजारों में हो, महीने के दौड़ भाग का किराया दौ सौ के करीब हो तो, बात अखरती नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली के हर चौक से गुजरने वाली इस पीली नीला बसों के मालिक सफेद कपड़े वाले लोग है। या उनके गुमनाम रिश्तेदार। एक एक मालिक के पास 20-40 गाड़िया है। और है हर रूट के थानेदार का पर्सनल नम्बर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जिन चौराहों पर धड़ाधड़ चालान कट रहे थे, उनपर ही कैसे बसें लोगों पर चढ़ रही है। क्या सरकार इसे जान बूझकर बर्दाश्त कर रही है। जिससे मंहगी हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों के लिए आधार बनाया जा सके।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;ब्लू लाइन बसों के रोडाना रवैये को सुधारने के तरीके अभी भी सरकार के पास है। बशर्ते अधिकारियो की जेब में अब कागज ज्यादा और पैसे कम हो। हर ब्लू लाइन पर सरकारी ट्रेंड स्टाफ और स्पीड गवर्नर, एक ऐसी मशीन जो गति को नियंत्रित करती है, लगाकर बसों को समझदार बनाया जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रही बात ट्रैफिक नियमों के पालन की तो डर अभी भी बरकरार है। लेकिन सड़कों पर नाचती ब्लू लाइन बसों का डर इस नियम के डर से ज्यादा महसूस होने लगा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-4867331211041585679?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/4867331211041585679/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=4867331211041585679' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/4867331211041585679'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/4867331211041585679'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/07/blog-post.html' title='नीली पीली बसों का खौफ'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/RopV41Y4sCI/AAAAAAAAAA8/-2hOfYt_uPY/s72-c/Buses-Delhi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-442419515035969948</id><published>2007-06-28T07:28:00.000-07:00</published><updated>2007-06-28T07:33:47.337-07:00</updated><title type='text'>ब्लॉगों की एजेंसी</title><content type='html'>&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://www.chitthajagat.in/?claim=lzlkyl0ydonx" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी"&gt;&lt;img src="http://www.chitthajagat.in/images/claim.gif" border="0" alt="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी" title="चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी";&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;!--chitthajagat claim code--&gt;&lt;br /&gt;क्या आपको लगता है कि ब्लाग को बाजार के करीब लाने के लिए किसी नियामक या एजेंसी की जरूरत है।&lt;br /&gt;आपकी प्रतिक्रियाएं एक रास्ता सुझा सकती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-442419515035969948?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/442419515035969948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=442419515035969948' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/442419515035969948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/442419515035969948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/blog-post_28.html' title='ब्लॉगों की एजेंसी'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-2802807910884916290</id><published>2007-06-25T09:39:00.000-07:00</published><updated>2008-12-08T13:39:03.891-08:00</updated><title type='text'>गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rn_wUNHmPvI/AAAAAAAAAA0/9Ny-tn1upWQ/s1600-h/trafficlongroad.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;" src="http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rn_wUNHmPvI/AAAAAAAAAA0/9Ny-tn1upWQ/s200/trafficlongroad.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5080043134606786290" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली में रहना है तो आपको किसी न किसी दिन जरूरत पड़ेगी रेजिडेंस प्रूफ की। रेजिडेंस प्रूफ। एक ऐसा प्रमाण पत्र  जो ये बताता है कि आप भला जगह के निवासी है। इसके होने से अपने आप एक सर्वाधिकारवाद के शिकार हो जाते है। ये ऐसा पेपर है जो आपको ये बताता है आप भले ही पैदा कहीं हुए हो, पर आप अब इस शहर में कुछ भी खरीद सकते है। &lt;strong&gt;ये खुले बाजार में एक तरह का नियंत्रण है। ऐसा नियंत्रण जो आपको याद दिलाता है कि आप भारत के नागरिक है। &lt;/strong&gt;नागरिक होने के भले ही एक भी कर्तव्य आप न निभा रहे हो, पर आप है एक अरब बीस तीस करोड़ के देश के एक कागजी नागरिक। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज सुबह से शाम के बीच दिल्ली के कई चौराहों पर भयंकर जाम मे फसने के बाद महसूस हुआ कि सच में इस शहर में बहुत गाड़ियां है। महसूस करने के लिए एक भाव की जरूरत होती है। जो संजोग से आज जगा। तो कैसे दौड़ रही है ये गाड़िया। अगर यहां रहने वाले बाशिंदे की जनसंख्या पचास लाख मानी जाए, हालांकि कहा जाता है कि दिल्ली का कोई नहीं। सब बाहर से आकर बसे है। बंटवारे के बाद पंजाबी आए, तो काम के लिहाज से बिहार और यूपी वाले। तो भी जो पिछले पचास साल से यहां है, उन्हे बाशिंदा मान ही लें, तो भी इस एक करोड़ बीस लाख वाले शहर में बाहरी जगहों से बसे है एक करोड़ के करीब लोग। ज्यादातर बीस से तीस साल के करीब से। &lt;strong&gt;पुराने लोगों के पास पीढ़ियों के हिसाब से गाड़ियां है। फिएट, एम्बैसडर और मारूति वाले।&lt;/strong&gt; लेकिन जिन लोगों ने पिछले दस साल में यहां अपनी बसेरा बसाया है, वे छोटी गाड़ियों के साथ रखते है एक बड़ी गाडी़। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस राजधानी में कई ऐसे लोग है जिनके पास सौ पचास गाड़िया भी है। मैने सुना था कि दिल्ली में कहा जाता है कि जिससे आपकी दुश्मनी हो, उसे ट्रांसपोर्टर बनने की सलाह दे दो। सो यहां दुश्मन बहुत है। देश के इस उत्तरी शहर से कही भी जाने के लिए सड़के अच्छी है। और मुनाफा भी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौटते है मूल मुद्दे पर। गाड़ी खरीदने के लिए चाहिए होता है रेजिंडेस प्रूफ। अगर मेरी जानकारी अधूरी नहीं है तो आप अगर एनसीआर, गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गाव, फरीदाबाद, में रहते है, तो आप दिल्ली की गाड़ी रख तो सकते है, खरीद नहीं। प्राब्लम है रेजिडेस प्रूफ। तो कैसे लोग सड़को पर गाड़ियों मे अटे पड़े है। कैसे आपको आंकड़े बताते है कि इस शहर में पचास लाख गाड़ियां है। मैने कई लोगों से पूछा कि इस शहर से ज्यादा पैसा तो मुंबई और अहमदाबाद में है। तो क्या इतना बम्बार्डमेंट क्यों हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाब खोज रहा हूं। मैने अपनी गाड़ी खरीदी, माफ करिएगा, पेशागत मजबूरी है, पचास लाख एक होने का। हां तो गाड़ी खरीदी तो प्रूफ का पेपर कंपनी ने दिया। और दोस्तों के घर के एग्रीमेंट कागज पर गाड़ी मिल गई। शायद पत्रकार होना कभी कभी काम आता है। खैर सवाल का जवाब जानना बाकी है। आपमें में से कोई साथी या पत्रकार कुछ नया बताए तो अच्छा लगेगा। रही बात मेरी तो, वादा है कि मैं जल्द ही आपको बताऊंगा कि क्यों दिल्ली के गाड़ियों की राजधानी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-2802807910884916290?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/2802807910884916290/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=2802807910884916290' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2802807910884916290'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2802807910884916290'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/blog-post_25.html' title='गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/Rn_wUNHmPvI/AAAAAAAAAA0/9Ny-tn1upWQ/s72-c/trafficlongroad.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-5213657730019217456</id><published>2007-06-21T15:11:00.000-07:00</published><updated>2007-06-21T15:12:22.559-07:00</updated><title type='text'>बाजार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-2</title><content type='html'>क्या किया जाए। कैसे बिना हाथ पांव मारे ही ब्लाग में प्रचारों की झड़ी लग जाए। रोजाना आप दो से चार घण्टे इंटरनेट से जूझते रहते है। दो चार लेखों को पढ़ते है। एक दो लिखकर छाप मारते है। और एक सामान्य ब्लागर हर घंटे ये देखने में ही बिता देता है कि कितने हिट आए औऱ कितने कमेंट। सारा फसाना इसी रूझान का है। मतलब आप अपने ब्लाग पर तो लोगों को देखना चाहते है, लेकिन आप कितना दूसरों के ब्लाग पर समय बिताते है। क्या रह रह कर आपको अपनी ओर खींचने वाले ब्लाग आपको कभी नीरस तो कभी बेकार से लगते है। क्यों। क्योंकि ज्यादातर ब्लाग चलाने वाले भी आपकी ही भावना से लिख लिखा रहे है। यानि ब्लाग चला रहे है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसा ब्लाग जो आपकी रूचि से ज्यादा किसी खास वर्ग, विशेष या उत्पाद पर टिका हो, निश्चित ही सीमित होगा। लेकिन ये सीमितता मल्टीप्लेक्स वाले दर्शक जैसी है। जो अमीर है और खर्चने वाला भी। मानिए आप साफ्टवेयर इंफार्मेशन का एक ब्लाग चला रहे है, तो आपको देखना होगा कि आपकी जानकारी साफ्टवेयर जगत तक कैसे पहुंचे। इंटरनेट के संजाल पर ये आसान है। लेकिन ब्लाग की दुनिया में मुश्किल।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरा जो सबसे कारगर उपाय होगा ब्लाग को आगे बढ़ाने का वो होगा, जुड़ाव। जुड़ाव, सुविधाओं से। सुविधा,  बिल जमा करने की, कर जमा करने की, टिकट लेने की, गैस की पर्ची की, और मोहल्ले की समस्या को उठाने की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानिए आपके मोहल्ले में कई जन सुविधाओं की समस्या है। तो ऐसे में अगर एक ऐसा ब्लाग हो, जो रोजना किसी न किसी नागरिक की समस्या को लिख रहा हो, और इससे आप अपने शहर की नगरपालिका को अवगत कराएं कि वो कागजों के रखरखाव से ऊपर उटकर वर्चुअल सरोकार पर आ गया है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये सामुदायिक होगा, और मोहल्ले के छोटे दुकानदार शायद इसके लिए विग्यापन भी मुहैय्या कराएं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिए आसमान को बड़ा मत बनाइए। किसी मेट्रिमोनियल साइट, नौकरी की वेबसाइट और बड़े उत्पाद के लिंक को खोदने की चाह न आपमें है और न ही किसी नवोचर चिट्ठेकार में। सो वहां से शुरू किया जाए,  जहां जगह बनानी आसान है। और इसके लिए आपका नगर, मोहल्ला, चौराहा और रिश्तेदार सबसे करीबी जरिया है, जो आपको बिन झिझके स्वीकारते है।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूध, सब्जी, ब्रेड, अखबार, अंडे ऐसी वस्तुए है जो आप रोज खरीदते है। और रोज की खरीदारी से जुड़ा है आपका समय। तो क्या इनके मोल तोल और इनकी मौजूदगी के बारे में बताकर आप लोगों का सीधा ध्यान नहीं खींच सकते। मुश्किल है। पर इंसानी दिमाग के आगे कुछ नहीं है जनाब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मैं हर दिन अपने दिमाग को खोद खोद कर सोच में लगा हूं कि कैसे। कैसे हम किसी रचनात्मक अवधारणा को एक बाजार में बदल सकते है। क्या बाजार सत्य है। नहीं, दरअसल बाजार की कीमत से तय होता है आपका मूल्यांकन। और मूल्यांकन ही सत्य है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-5213657730019217456?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/5213657730019217456/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=5213657730019217456' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5213657730019217456'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5213657730019217456'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/2.html' title='बाजार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-2'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-5714094189806789091</id><published>2007-06-20T05:06:00.000-07:00</published><updated>2007-06-20T05:08:50.712-07:00</updated><title type='text'>बाज़ार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-1</title><content type='html'>सवाल उठता है कि ब्लाग को बाजार में बेचा कैसे जाए। क्या प्रचार की बाट जोही जाए। कि गूगल के जरिए ये इंतजार किया जाए कि वो कमाए तो हम पाएं। आज जितने भी जनसंचार माध्यम है वे अपनी कमाई के लिए बाजार के प्रचार पर पूरी तौर पर निर्भर है। और जो सीमित जनसंचार के माध्यम है, जैसे सामुदायिक रेडियो, वे केवल स्वांतह सुखाय जन हिताय से गुजारा करते है। देखा जाए तो उद्देश्य दोनों के पास है। जनसंचार के बड़े माध्यम, अखबार, रेडियो और टीवी रोजमर्रा के लिए जो पैदा करते है, उनका जीवन चलाने में जो योगदान है, वहीं सामुदायिक माध्यम का छोटे इलाकों में अनाज, पशु व्यापार और मौसम में है। तो ब्लाग का उपयोग किस लिए है। जरा खुद से पूछिए कि आप क्यों चला रहे है ब्लाग।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जबाव आते ही आपको पता लगेगा कि आप किसी व्यवसाय के लिए ये जद्दोजहद कर ही नहीं रहे है। इसीलिए इसे कैसे बेचा जाए, ये आपको पता ही नहीं है। हां देखादेखी में आपने भी गूगल और अन्य प्रचार स्रोत लगा रखें है। आज हिंदी में ऐसे कई ब्लाग है, जो रोजाना सैकड़ों हिट पाते है। लेकिन बाजार इन सूचकांको को तव्वजों नहीं दे रहा। क्यों।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;वजह है अनियंत्रित विकास। तकनीकी और बाजार में बिकने वाले उत्पादों से दूरी। और सबसे बड़ी नैतिक दिक्कत है भाषा की क्लिष्टता औऱ दुरूहता। एक एक करके आता हूं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आपने ऐसा कोई ब्लाग देखा है, जिसे आप अनोखा या विशेष कह सकें। मैं जानता हूं कि आप कहेंगे, कई है। लेकिन समझे। कविता, कहानी, किस्से,. रचनाए और तरह तरह की लेखनी को कैसे बाजार मिल सकते है, जब इस देश में हिंदी साहित्य को स्वांतह सुखाय के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। ब्लाग में कंटेंट क्या हो। ये तय करने से पहले ये जाने कि क्या जरूरत है आपके आसपास। आप खुद के सुख और दुख के लिए जो चाहे रचें, लेकिन बेचने के लिए चुना गया विषय ऐसा हो जिसमें आपकी रूचि कम, खरीदार की ज्यादा हो। जैसे आपके मुहल्ले में बिजली जाती रहती है। तो क्यों न आप एक स्थानीय इनवर्टर कंपनी से बात करके उसके उत्पाद के लिए और देश को बताने के लिए लिखें। ये एडवर्टोरियल जैसा होगा। लेकिन आप कहेंगे कि ये तो दलाली जैसा है। मैं विस्तार से बताता हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में बिजली बड़ी समस्या है। और इसके लिए गैर परंपरागत ऊर्जा सोत्रो पर निर्भरता की बात बार बार कही जाती है। आपने क्या किसी को ये बताया है कि इस नान कंवेंनशनल उर्जा के फायदे औऱ नुकसान क्या क्या है। और क्या आपने ये सोचा है कि आप केवल इस विषय पर अगर एक महीने तक लिखते रहे और फिऱ इस और किसी सरकारी या निजी कंपनी ने ध्यान दिया, तो वो आपको अपना प्रचारक मान सकती है। और फिर आप उनके लिए एक ब्लाग चला सकते है। कंपनियों की वेबसाइटें होती है। लेकिन आपके ब्लाग की लोकप्रियता औऱ आपकी सस्ती प्रस्तुति किसी भी छोटे निवेश को आकर्षित कर सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये सारे प्रयोग उन सभी विषयों पर किए जा सकते है, जो आपके आस पास से जुड़े है। केवल ध्यान इतना रखना होगा कि आपको पढने वाले लोकल लोग ज्यादा हो। इसके लिए सीधा सा जरिया है लोकल प्रचार। आप किसी भी दिन किसी अखबार में ढ़ाई सौ रूपए खर्च करके अपने ब्लाग को सौ पचास लोगों में पहुंचा सकते है। बाकी काम आपके ब्लाग पर मौजूद सामग्री और वर्ड आफ माउथ से हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आगे आने वाले दिनों में मैं कोशिश करूंगा कि आपको तथ्यो से अवगत करा सकूं। आपके सुझाव और सलाह इस हिंदी ब्लाग जगत को उत्पादक और उर्वरा बना सकते है। सो जारी रहिए। एक सूचनात्मक ब्लाग के साथ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-5714094189806789091?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/5714094189806789091/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=5714094189806789091' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5714094189806789091'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5714094189806789091'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/1.html' title='बाज़ार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-1'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-2726187311516611112</id><published>2007-06-19T07:19:00.000-07:00</published><updated>2007-06-19T07:26:11.915-07:00</updated><title type='text'>कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिए</title><content type='html'>मीडिया की नई सीमित विधा के पेंच जगजाहिर हो रहे हैं। &lt;a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Blog"&gt;ब्लाग&lt;/a&gt;। एक ऐसा माध्यम जो यूटोपिया में ज्यादा जीता है, अपने विस्तार से पहले अनजानी व्यक्तिगत बहसों में सिमटता जा रहा है। जानते हैं क्यों। क्योंकि संवाद के जिस माध्यम को ब्लाग की दुनिया सर्वव्यापक मानती है, वो नितांत अव्यवहारिक और असंचारी है। टीवी, रेडियो या अखबार के सामने वो केवल एक दिन के विग्यापन के बराबर ठहरता है। और इंटरनेट की दुनिया में वो केवल हलचली झटके जैसा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विकसित देशों के ब्लागों की अहमियत इस वजह है, क्योंकि उनके पाठक वर्ग तय है। यहां ऐसा होने के पहले ही खींचतान मची हुई है। व्यक्तिगत दुराग्रहों पर। दुनिया के सबसे मशहूर ब्लाग या तो तकनीकी पर केंद्रित है या तो वे इंसान की व्यक्तिगत जीवन की डायरी है। ऐसे में विचारधारा पर शब्दों की बर्बादी का तुक कहां ठहरता है। जिन समाजों में ब्लाग बहुत खुली हवा में नहीं लिखे जा रहे हैं, वहां भी लिखने वाले दिन प्रतिदिन की हरकतों को दर्ज करके जगह बना रहे हैं। हमने उनकी सीखी कम, किनारा ज्यादा कसा है। एक जमाना था, जब इंटरनेट पर केवल ईमेल चेक किए जाते थे। आज शहरों में ये पोर्नोग्राफी से आगे बढ़कर एकाउंट्स और मनोरंजक वेबसाइटों तक आ पहुंचा है। आज कम्प्यूटर के विश्व पन्ने पर &lt;a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/"&gt;बीबीसी &lt;/a&gt;और &lt;a href="http://ind.jagran.com/"&gt;जागरण&lt;/a&gt; है तो &lt;a href="http://zapak.com/"&gt;जपाक&lt;/a&gt; और &lt;a href="http://www.nintendo.com/"&gt;निनटेंडों&lt;/a&gt; भी समान दखल रखते है। हमें जागना होगा। बिकता वो है जो उत्पादक होता है। यहां से उठाकर, वहां से कापी करके खबरों को चेपते रहने से कोई नया उत्पाद नहीं बनता भई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर। जिस रचनात्मकता की जरूरत आज भारत में ब्लाग को थी, वो नदारद है। आज भी सारे ब्लाग प्रचारक यंत्र या &lt;a href="http://technorati.com/"&gt;विजेट्स&lt;/a&gt; विदेशी कंपनियों की देन है। आज भी हमारे पास वो सामग्री नहीं है जो बाजार के सामने बिकने लायक हो। आज भी हम कविता, कहानी या बेहद जाया माने जाने वाली बहसो में पड़ है। और दुनिया में लोगों ने ब्लाग से जुड़ा एक बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। मैं बाजार के साथ खड़ा हूं। अमिताभ बिकते है, क्योंकि बाजार के उत्पादों में वे मौजूद है। आप अखरते है, तो आप रचते ही मिट जाने के लिए हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानिए आज जो भी हिंदी ब्लाग के साथ है, वो बाजार के साथ नहीं है। क्यों। क्योंकि आपने मुफ्त में मिलने वाली एक विधा को केवल अनुत्पादक पैदा करने में लगाया है। उत्पाद वो होता है, जिसपर बाजार विमर्श करें। आपसे कहे कि ऐसा रचो यार। आप अपनी क्रियात्मकता के साथ साथ जगह भी बना पाते। लेकिन अफसोस जिससे थी नाम की कामना, वो मिट गया नाम ही नाम में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर, अभी केवल एक अर्सा ही गुजरा है। अभी तो दौर बाकी है। ब्लाग को प्रचलित करने की बजाय उसे अपने संपर्को से बेचिए। ये बेचना जमीर या ईमान बेचने जैसा नहीं है। उसे अपनी रचनात्मकता की कीमत मिलनी चाहिए। हर रचना की एक हैसियत और कीमत होती है। और फिर एक ऐसा वर्ग ढूंढिए जो आपको देखना और पढना चाहे। छोटे शहरों में ब्लाग केवल एक शब्द है। और इन्ही शहरों के लोगों को बड़े शहरों में आना है। तो क्या आपके वो जानकारी नहीं है, जो इन्हे मदद कर सके। फोकस हो करके ही आप जान सकते है कि क्या पेश किया जाए। बाकी शब्दों से रचना है तो महाभारत और रामायण रचिए। कूड़े में शब्दों को लपेटकर परोसना बंद ही करें तो बेहतर।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-2726187311516611112?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/2726187311516611112/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=2726187311516611112' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2726187311516611112'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/2726187311516611112'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/blog-post_19.html' title='कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिए'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-53908965375115419</id><published>2007-06-08T10:52:00.000-07:00</published><updated>2007-06-08T10:55:42.789-07:00</updated><title type='text'>मैं एक पत्रकार हूं</title><content type='html'>&lt;strong&gt;मुझे जिंदा रहना है&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मुझे नौकरी करनी है।&lt;br /&gt;एक बार किसी बात में&lt;br /&gt;मां ने कहा कि जीवन में ऐसा&lt;br /&gt;करना जो नाम रोशन करने जैसा हो&lt;br /&gt;मैने छोड़ दी एक चैन की सरकारी नौकरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;और&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;अब हूं एक मोर्चे पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं सैनिक नहीं हूं।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;होता तो घरवाले हर हादसे पर सिहर जाते&lt;br /&gt;पत्नी और बच्चे एक आम सी जिंदगी में बिसर जाते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं अधिकारी भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;होता तो घूसखोर होकर सो जाता&lt;br /&gt;देश का खाकर परिवार को भागी बनाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं नेता भी नहीं&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;होता तो सफेदी से कालिख छुपाता&lt;br /&gt;रोजाना वादों से दुनिया को बहलाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं अभिनेता भी नहीं&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;रोज एक किरदार में जीता&lt;br /&gt;रोज एक किरदार को सीता&lt;br /&gt;लेकिन रहता बिना भाव के&lt;br /&gt;होता किसी के लिए राह का कांटा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं वैज्ञानिक भी नहीं&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;सोचता और बनाता देश के लिए&lt;br /&gt;लेकिन मेरी अहमियत खुद के लिए&lt;br /&gt;केवल एक सामान्य समर्पित गुमनाम&lt;br /&gt;शख्स की होती, मैं खुश न होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं क्या हूं।&lt;br /&gt;मैं क्यों हूं।&lt;br /&gt;मैं कैसा हूं। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;पर जानते है मैं खुश हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;मैं एक पत्रकार हूं।&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;जो, सबके लिए सोता जागता है&lt;br /&gt;जो, आपकी चिंता को अपना बनाता है&lt;br /&gt;जो, सबसे आपके लिए लड़ने को तैयार है&lt;br /&gt;जो, नाम से शुरू होकर काम में खो जाता है&lt;br /&gt;रोजाना, खास होकर मैं अब भी आम हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मैं पत्रकार हूं।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-53908965375115419?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/53908965375115419/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=53908965375115419' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/53908965375115419'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/53908965375115419'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/blog-post_08.html' title='मैं एक पत्रकार हूं'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-388537872114386569</id><published>2007-06-04T01:50:00.000-07:00</published><updated>2007-06-04T01:57:03.823-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्रम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मजदूर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शहर'/><title type='text'>मजूर चाहिए का हजूर</title><content type='html'>आज सुबह की बात है। नोएडा का लेबर चौराहा। मैं बेल के शर्बत के लिए अपनी गाड़ी चौराहे पर लगे एक ठेले पर रोकता हूं। इधर उधर देखता हूं। बेल वाले को एक गिलास देने को कहता हूं। कि अचानक एक भीड़ मुझे घेर लेती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं नोएडा से गाजियाबाद हाइवे पर बने लेबर चौराहे, जिसका नाम ही इस वजह से पड़ा है, क्योंकि यहां रोजाना सुबह सुबह मजदूर एक लाइन में भीड़ लगाकर खड़े हो जाता है। रोजाना। ये वे मजदूर है, जो रोज कमाते है, रोज खरीदते है, खाते है, सो जाते है और दोबारा सुबह इसी चौराहे पर पाए जाते है। ये एक गुमनाम भीड़ है। जो हर शहर में मौजूद है। लेकिन सूरज ढलने के बाद से शहर की रोशनी में गायब हो जाती है। ये भवनों को बनाती है और बनने तक उसी में रहबसेरा करती है। और बनने के बाद ये उजड़ जाती है। उजड़ना, बसना इनकी फितरत नहीं, मजबूरी है। ये घुमंतु प्रजाति के भी नहीं है। ये शहरों में आसपास के गावों से आते है। कुछ अपनी जमीन से एक हजार किमी दूर है। तो कुछ एक सौ किमी। लेकिन रोजाना कमाना और उस दिन का जीवन उसी दिन बिसार देना इनकी किस्मत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी दोपहिया से इधर उधर देखा। अचानक भीड़ का दायरा बढ़ गया। आवाजें एक थी। मजूर चाहिए का। साहब कहां जाना है। चलिए अभी चलते है। किस एरिया में। मजूर का जरूरत है का। मैं अवाक। मैने अभी इस शहर में घर बनाने को नहीं सोचा है। सोचता हूं तो अपनी तनख्वाह और ईएमआई के जाल में घुटा महसूस करता हूं। मैने पूछा, कितना लोगे। आवाजे आई कितना लोग चाहिए। मैने कहां रेट का है। किसी ने अस्सी कहा किसी ने धीरे से पिचहत्तर कहा। मैने कहा अब तो दिन का ग्यारह बज गया है। तो भी इतना। मैं भी पूंजी औऱ श्रम के रिश्ते की जोड़ने लगा है। अरे साहब देर तक काम भी तो करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये वो मजूर है, जो सुबह छह बजे से खड़े है, आज काम नहीं मिला है। घर खाली जाने से घर में चूल्हा नहीं जल पाएगा। या जलेगा भी तो बर्तन में पानी ज्यादा होगा। खाना कम। वे पेट काटना सीख चुके है। पर जेब काटना नहीं चाहते है। मेहनत करते है। पर पैसा नहीं पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या हम सोच रहे है। क्या हम देख रहे है। शहर के विकास ने अब बने बनाए घर खरीदने की चाहत को परवान चढ़ाया है। कौन बनवाए याऱ। या बनवाना भी है तो, ठेकेदार को दे दो। ठेकेदार, जो एक बीच का जीव है, आपके मकान और मजूर के बीच का। और बीच वाला इस देश में अमीर बहुत हो चला है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सबसे हाथ जोड़ा और कहां नहीं मैं तो बेल का शर्बत पीने रूका था। अभी मजूर नहीं चाहिए। आउंगा किसी दिन। एक ऐसा वायदा जो मैं पूरा नहीं करना चाहूंगा। और अगर पूरा कर पाया, तो मैं मजूर से मोल तोल नहीं करूगां।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-388537872114386569?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/388537872114386569/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=388537872114386569' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/388537872114386569'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/388537872114386569'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/06/blog-post.html' title='मजूर चाहिए का हजूर'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3062168737056359719</id><published>2007-05-22T02:54:00.000-07:00</published><updated>2007-05-22T03:31:49.027-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रेजगारी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अर्थव्यस्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिक्के'/><title type='text'>चिल्लर की अर्थव्यवस्था</title><content type='html'>फुटकर नहीं है। कहां से लाए चिल्लर। भईया टाफी दे दें। देश में फुटकर की एक अर्थव्यवस्था है। रेजगारी के तौर पर सिक्कों को लोग जेब में रखना पसंद नहीं करते। सो चौराहों पर खड़े हाथ फैलाए भिखारियों की चांदी होती है। भिखारी शब्द भीख मांगने से बना। लेकिन बीते दिनों पता चाला कि वे हमसे ज्यादा कमाते है, उनके फ्लैट है और वे बिन दिखाएं लखपति है। भला हो। ये भी एक तरह का सामाजिक असंतुलन है। खैर। मैं फुटकर सिक्कों पर आता हूं। गोरखपुर में आप पैंतीस रूपयों के सिक्कों के बदले पचास रूपए पा सकते है। मैं प्राचीन सिक्कों की बात नहीं कर रहा। एक रूपए और दो रूपए के नए सिक्कों को लेकर आप एक नया विनिमय का धंधा चला सकते है। आज की तारीख में जब एक और दो रूपए के नोट नजर नहीं आते, ऐसे में सिक्कों की तंगी ने शहर गोरखपुर और शायद आसपास के इलाकों में हाहाकार मचा रखा है। मैने सोचा वजह तलाशी जाए। मैने फुटकर दुकानदारों से लेकर रेस्तरां तक पता किया, सबका ये मानना था कि रेजकारी गायब हो गई है। पहले भिखारी और छोटा सौदा करने वाले सिक्कों को बड़े दुकानदारों को देकर नोट ले जाते थे, अब वे कहां अपना फुटकर सुपुर्द कर रहे है। ये रहस्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन घण्टाघर के पास मौजूद आभूषण बाजार में जाना हुआ। बीच में एक खबर में पता चला कि जब ब्यूरो आफ इंडियन स्टैण्डर्स ने देश के सैकड़ों दुकानों में सोने के सैम्पल लिए, तो केवल कुछ ही खरा सोना बेचने वाले निकले। मैने अपने घर वालो को समझाया कि वे बीआईएस छाप वाले गहने ही खऱीदे। सो मैं भी ये देखने में लगा था कि कितना सोना खरा है इस बाजार में। अचानक देखा एक ओर एक फटीचर सा आदमी एक भारी झोले के साथ बैठा था। लगा कि कोई गांव का सौदागर है बेटी की शादी के लिए जेवर खरीदने आया होगा। और झोले में सत्तू या पगड़ी रखी होगी। पर झोला बड़ा ही बेमेल सा नजर आ रहा था। फिर उसने झोले में हाथ डाला और पालीथीन के बंडल निकालने चालू किए। हर बंडल में सिक्के के ठेर थे। तकीबन पांच सौ से एक हजार की रेजगारी। मैने उत्सुकतावश दुकानदार से पूछा कि इन सिक्कों का क्या करेंगे। उसने कहा मेरी और चीजों की दुकाने है, वहां काम आएगी। मुझे यकीन न हुआ। सौ दो सौ के सिक्के समझ आते है। मैं वापस चला आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मन में कौतुहल मचा हुआ था, सो शाम को अपनी दोपहिया उठाकर फिर दुकान बंद होने के समय उसी बाजार में चला आया। दुकानें बंद हो रही थी, और कारीगर वापस जा रहे थे। एक चाय की दुकान पर देखा कुछ कारीगर बतिया रहे थे। मैने अपनी गाड़ी पहले लगा दी, और धीरे से वहां पहुंचा। बातों बातों में मैने चाय वाले से कहा कि चाय पिला दो, लेकिन सौ का नोट है। उसने कहा अरे बाबू छुट्टा कहां है, सारा छुट्टा तो सोनार बटोर ले रहे है। उसने कारीगरों की ओर देखकर फींकी सी हंसी दी। मैने कहां मतलब। तो एक कारीगर जो ज्यादा बड़बोला था, बोल पड़ा। देखिए भईया सौ सोनार की एक लौहार की। पर लोहार कहां है, ई पता नहीं। मैने कहां मेरे पास तो एक हजार का रेजगारी गुल्लक में पड़ी है। उसने कहा कल लेते आइएगा, मैं सौदा करवा दूंगा। मैने कहा कैसा सौदा। उसने मुझे किनारे ले जाकर कहा कि सेठ जी लोगों को सिक्के चाहिए और आपको इसके बदले ज्यादा रकम मिल जाएगी। मेरा संशय बढ़ता जा रहा था। मैने कहां क्यों। उसने कहां किसी से कहिएगा नहीं। दरअसल सोनार लोग चांदी और सोने के आभूषणों में मिलावट कर रहे हैं। मैने कहां ये को हमेशा होता आया है। नया क्या है। उसने कहां कि वे गिलण्ट के सिक्को को गलाकर आभूषणों में मिला रहे है। ये सबसे सस्ता पड़ता है। मैने पूछा किस मात्रा में। वो बिदक पड़ा। आप सोनार है क्या। मैने कहां नहीं मैं जानना चाहता था। तभी कारीगरों ने इस कारीगर को आवाज लगा दी। और मात्रा का सवाल ठहर गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक खुलासा मेरे सामने था। तो सोने और चांदी के बाजार में ये नई मिलावट का किस्सा था। अब आप ही तय करें कि कौन ज्यादा ईमानदार सड़क पर हाथ फैलाने वाला लखपति भिखारी या सोने चांदी में सिक्को की मिलावट वाला व्यापारी। दोनों नें सिक्कों की कालाबाजारी शुरू कर दी है। अब देखना है कि ग्राहक का सिक्का किस काम आता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3062168737056359719?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3062168737056359719/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=3062168737056359719' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3062168737056359719'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3062168737056359719'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html' title='चिल्लर की अर्थव्यवस्था'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-1879320534816943850</id><published>2007-05-21T00:24:00.000-07:00</published><updated>2007-05-21T00:27:26.869-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोरखपुर'/><title type='text'>हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2</title><content type='html'>चाय मेरे हाथ में थी। नमकीन काली चाय। मन में कई तरह के स्वाद पनप रहे थे। कैसी होगी ये सड़कछाप चाय। वैसे भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है। तो मैने चाय वाले युवक को बिना पैसे दिए एक नया स्वाद चखने का मन बना लिया। और यकीन जानिए इस नए इरादे के लिए न तो मन तैयार था न तो जबान। खैर युवक इस बीच में अपनी बातें बताता रहा कि कैसे इस चाय से दिन की शुरूआत करने से हाजमा और गैस की दिक्कत नहीं रहती। और तो और आपका दिन भर पेट हल्का बना रहता है। अपने ग्राहकों का हवाला भी उसने दिया। वैसे जिस भी ग्राहक के बारे में वो बता रहा था, वो न तो ब्राण्ड थे और न ही अमीर। हमारे मुहल्ले में सड़क किनारे सब्जी का एक बड़ा बाजार लगता है। और उसके ग्राहक वही सब्जी वाले थे। बातों बातों में चाय वाला अपनी इस इजाद की कहानी भी बता गया कि किस तरह उसने नया सोचा और उसे बेचने में सफल रहा। हालांकि इसके पेटेण्ट के बारे में उसने सोचा भी न होगा। मैने प्लास्टिक के कप को मुंह से लगाया। मध्यम गर्म चाय का पहला स्वाद मेरे होठों से टकराया। और जबान में तीखापन छा गया। लगा जैसे आमपना को गर्म करके पिलाया जा रहा हो। लेकिन ये अनोखा था। दूसरा, तीसरा और चौथे सिप तक ये स्वाद भाता जा रहा था। कुल आठ घूंटों में चाय खत्म थी। और मैं हतप्रभ भाव से चाय वाले को देख रहा था। शिव खेड़ा की मशहूर किताब-यू कैन विन- में एक उदाहरण है। एक ठण्डी चाय बनाने और उसे प्रचलित करने की जद्दोजदह का। आज हर कैफै में कोल्ड टी बिकती है। मैं सोच रहा था कि अगर इस चटपटी चाय को उद्योग में परिवर्तित किया जाए तो बुरा न होगा। पर सवाल यही था। चाय वाले ने मुझे बताया कि पहले पहल उसने ये चाय खुद पी, परिवार को पिलाई और फिर ग्राहकों को, इस विश्वास के साथ कि, ये दवा है, पेट की चटपटी दवा। और धंधा चल निकला। अब उसे कम्पटीशन झेलना पड़ा रहा है। हमारे मुहल्ले में अब तकरीबन चार से पांच चाय वाले है। वैसे वो चाय बनाने की सामग्री नहीं बताता और चाय को हाजमोला की चाय बताकर बेचता है। लेकिन ये सच नहीं लगता। स्वाद से एकबारगी लगता है कि ये काली चाय में हाजमोला डालकर बनाई गई चाय होगी। लेकिन कुछ ऐसा मसाला भी है, जो वो नहीं बताता। ये कोक और पेप्सी जैसा राज है। उघोगधर्मिता का स्पष्ट उदाहरण वो चाय वाला अभी मेरे मुहल्ले तक सीमित है। लेकिन उसका स्वाद आज मेरी जुबान पर है। और पता नहीं कल ये हाजमोला की नई खोज न बन जाए। वैसे मैं जानता हूं कि स्वाद को बता पाना शब्दों में मुश्किल है। लेकिन यकीन जानिए चटपटी चाय का स्वाद अनोखा और अलग जरूर था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-1879320534816943850?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/1879320534816943850/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=1879320534816943850' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/1879320534816943850'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/1879320534816943850'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/2.html' title='हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3241771154472076202</id><published>2007-05-18T07:47:00.000-07:00</published><updated>2007-05-18T07:51:03.969-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नमकीन चाय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चाय गरम चाय'/><title type='text'>हाजमोला की चाय, गोरखपुर से</title><content type='html'>चाय गरम चाय। नमकीन चाय। पेट को दुरूस्त रखे चाय। हाजमोला की चाय। चौदह मई की शाम। अपने शहर गोरखपुर में शाम को सब्जी मंडी में हरियाली देख रहा था। कान में ये आवाजें पड़ी। चौंका। देखा एक मध्यम साइज की केटली में एक बीस बाइस साल का लड़का ये पुकार लगा रहा था। चलिए ये बात तो आम है। लेकिन जो शब्द वो कह रहा था, उसका चाय से नाता जोड़ना मुश्किन लगा। पेट को दुरूस्त रखे चाय। कहां बचपन से चाय पीने से गैस, कब्ज और एसिडिटी की शिकायत का राग, कहां पेट को दुरूस्त रखने वाली नमकीन चाय। हाजमोला की चाय। दिल्ली में आने के बाद, पहले हैदराबाद में था, मैने कई किस्म की चाय चखी। अपने शहर में पढ़ाई के दौरान भी कुछ मुस्लिम दोस्तों के घर नमकीन चाय भी पी। सुना गले में खराश हो तो चाय में नमक डालने से राहत मिलती है। दिल्ली में बाराखम्भा, कनाट प्लेस पर आक्सफोर्ड में बैठकर कई किस्म की चाय का लुत्फ उठाने के बाद ये नई नमकीन पाचक चाय के बारे में सुनकर कौतुहल हुआ। खैर। खासियत और भी थी। मैने कहा। एक कप पिलाओ तो। कप। कभी शहर की सड़क पर चलती बिकती दुकानों में कप मिलता है। पर आदतन कहा। नमकीन चायवाले ने भी अपने काले हो चुके झोले से एक प्लास्टिक का लम्बी थैली निकाली। तकरीबन बीस से तीस प्लास्टिक के गिलास दिखे। मानो मदारी का खेल चल रहा हो, और मैं तमाशबीन बनकर हर हरकत को जादू भरी नजरों से देख रहा था। इस सारे चाय फसाने में मैने उससे इस नमकीन चाय का इतिहास पूछ डाला। पता चला बंगाल की देन है। ऐसा वो कहता है। मैने माना तो नहीं। क्योंकि दार्जिलिंग की चाय किसने न सुनी होगी। और उसे नमकीन बनाकर पीने की कौन सोचे। खैर चाय बेचने वाला बंगाली था। या बांग्लादेशी। चाय के जिस कप या गिलास को उसने निकाला वो महज उतने ही प्लास्टिक से बना होगा जितना रोजाना इस्तेमाल की जाने आधा किलो की पालिथीन में लगता होता। वो डेढ़ इंच का गिलास था, गहराई रही होगी आपकी बीच वाली ऊंगली का आधा। यानि अगर आपने इधर पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर चरणामृत खाया, होगा, तो आपको बताए गए गिलास या कप का अंदाजा होगा। खैर चाय दो घूंट थी। क्या ये बेचने की रणनीति थी। कि अगर किसी को न भी पसंद आए तो वो मुंह भी न बिचका पाए। हाथ में चाय का कप थामने के बाद एक पंच सितारा रेस्तरां में करीने से पेश की जाने वाली शराब के पैग का ध्यान आया। एक सौ दस मिली एक पैग में शीशे के गिलास से। और काकटेल में तीन या चार तरह के पेय। वैसी ही गिलास से मिलाए जाते है। वो पेश करने की तरीका ही आपकी प्यास और ललक बढ़ा दे। लेकिन गोरखपुर के मोहद्दीपुर मोहल्ले के इस युवा के हाथों से पकड़ी चाय थामने में और हलक से उतारने दोनों में कठिनता महसूस हो रही थी। दिमाग में तरह तरह के संशय। और चाय के पिछले लिए गए स्वादों की महक और याद। लेकिन सोचा, नया लेकर तो देखा जाए। मैने सारी सोच को किनारे रखते हुए पहला सिप लिया। एक अजब सा स्वाद। ये बताना जरूरी है कि ये आपकी लाल या धूसर रंग की चाय नहीं थी। ये काली चाय थी। शुद्ध असमी चाय जैसी। यानि मेरे हाथ में थी, एक नमकीन काली चाय। ज्यादा लिख गया। लेकिन मेरे पास लिखने को अभी काफी कुछ है। लेकिन इस सबके बारे में कल...तब तक आप अपनी प्रतिक्रियाओं से ये बताइए कि इस किस्सागो में और क्या बचा होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3241771154472076202?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3241771154472076202/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=3241771154472076202' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3241771154472076202'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/3241771154472076202'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/blog-post_18.html' title='हाजमोला की चाय, गोरखपुर से'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-6540447561702351956</id><published>2007-05-10T00:41:00.000-07:00</published><updated>2007-05-10T00:42:15.782-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ग्लोबल वार्मिंग'/><title type='text'>जलेंगे आप जलेंगे हम, जलेगा हमारा चमन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;कोलाहल है मचा&lt;br /&gt;धरती रही उबल&lt;br /&gt;इंसान की फितरत में&lt;br /&gt;नहीं है सुधरने का शगल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पृथ्वी तप रही है। इंसान को इसकी चिंता नहीं है। हो भी क्यों। उसके घर में एसी है, कूलर है, पंखा है। हिमखण्ड पिघल रहे है। नदियां उफान पर है। पर इंसान क्या करें। उसके घर, पानी है, फ्रिज है, बर्फ है। खेतों में सूखा पड़ रहा है। पर इंसान के घर खाना है, अनाज है और है ईंधन। तो क्या इसे नियामत की भूल कहें। या किसी एक सभ्यता के कर्मों की बानगी। हवा में तपिश,  बादलों में रूखापन, पानी में जलन,  माहौल में उमस और पसीने का कंटक। ये बदलाव आ चुका है। दिल्ली की तपती दोपहरी में आप जल रहे है। मुंबई में सागर है, सो तापमान टिका है, लेकिन यही समुद्र लील लेगा, एक दिन एक बड़ी आबादी। धीरे धीरे वो अपना दायरा बढ़ाएगा, और इंसान का चूल्हा चौका सोफा बिस्तरा और दीवाले ढह जाएंगी। कोलकाता में आबादी का समुद्र है, सो एक अकाल वहां इंतजार में है। अकाल से मौत होना जायज है। असंख्यों की मौत। चेन्नई का मरीना बीच सुंदर है। लोग सामान्यता में जीते है। लेकिन पानी उन्हे नहीं बख्शेगा। भारत जैसे देश को गंगा जोड़ती है। गंगा में उफान पाप नहीं धुलेगा, पापी का नाश ही कर देगा। और ये सब करने के बाद गंगा वापस लौट जाएगी। शिव की जटाओं में। डरना जरूरी है। आप नहीं आपका संसार सिसकेगा। पानी और धूप के बीच का नाता टूट जाएगा। और रह जाएगी भाप। गर्म भाप। जो खेतों की माटी में छोटी छोटी दरारें पैदा कर देगी। जो फसलों की हरियाली से जलन रखेगी। जो बादलों के धुंधलके से खार खाएगी। और देगी एक नीरस मौसम। गर्म मौसम। जाड़ों की चाहत और स्वेटर पर चलते हाथ रूक जाएंगे। और बहेगी लू। करीब ही आग से लौ निकलेगी और जंगलों में वो सूखे पत्तों से दोस्ती गांठ कर एक चिरचिराहट के साथ सब कुछ लालिमा में लाकर, काला कर देगी। चिंगारी से कही भी कुछ भी खाक में बदल जाएगा। और आप के चेहरे पर पसीना बना रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये ग्लोबल वार्मिंग है। वैश्विक गर्मी। जो आपके हमारे और हम सबके किए गए प्राकृतिक अत्याचारों का नतीजा है। हमने पेड़ काटे, हमने गाड़िया दौड़ाई, हमने उर्जा का दोहन किया, और उसके बदले दिया पृथ्वी को धुआं और अप्राकृतिक उष्मा। जिसका परिणाम है असंतुलन। हिमखण्डों ने पिघलना शुरू कर दिया है। वे अब सिमट रहे है। अपना अस्तित्व खो रहे है। और अपनी जलधाराओं को सोख रहे है। वे अब गर्मी से हार चुके है। और अपना सारा गुस्सा अब उतारने के करीब खड़े है। तो क्या मानव जाति को अब दिन गिनने चाहिए। क्या अब करने को कुछ बचा है। क्या हम फिर से संतुलित हो पाएंगे।&lt;br /&gt;हां। पर केवल आपके त्यागने से। केवल आपके छोड़ने और लागू करने से। क्या तैयार है कल से साइकिल से आफिस जाने के लिए। चीनी, जापानी ये कर रहे है। पर आप तो उनसे बड़े है। क्या तैयार है बायोडिग्रेडेबिल साधनों पर खाना बनाने के लिए। पर आप तो बिना माइक्रोवेव ओवन के खा ही नहीं सकते है। मैं सबकी बात नहीं करता। पर कारकों की बात जरूरी है। तो क्या कल से मान लूं कि एयरकंडीशनर के बिना आप सो लेंगे आप। कैसे, गर्मी इतनी है, मैं सड़ नहीं सकता। पर यकीन जानिए। आज केवल हर घर घर में गर्मी को रोककर आप अपने नौनिहालों को हीटरी वातावरण में जीने से रोक सकते है। मेरी बात पर नहीं यकीन है, तो आज की दोपहर अपने शहर में नंगे पांव निकल कर देखिए। छाले न प़ड़ जाएं तो कहिएगा। इसे ऐसा आपने बनाया है। और अगर इसे और भयावह नहीं बनाना चाहते तो रूक जाइए। वरना ग्लोबल वार्मिंग का पहला असर आपके पानी, धूप, खाने, ईंधन और जिंदगी पर पड़ेगा। और जिसे झेलने की ताकत आपमें नहीं बची होगी। और एक बात, शहर मकानों से नहीं, हरियाली से भी बनता है। तो कम से कम घर में एक आक्सीजन देने वाला पौधा जरूर लगा लें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-6540447561702351956?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/6540447561702351956/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=6540447561702351956' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6540447561702351956'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6540447561702351956'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/blog-post_2270.html' title='जलेंगे आप जलेंगे हम, जलेगा हमारा चमन'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-6203481707001059786</id><published>2007-05-10T00:39:00.000-07:00</published><updated>2007-05-10T00:40:51.329-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमिताभ बच्चन'/><title type='text'>सदी का सामान्य महानायक</title><content type='html'>सदी के महानायक ने जब कहा कि जुर्म यहां कम है, तो ये बात बहुतों को नागवार गुजरी। सदी के कालपुरुष ने जब मंदिर मंदिर जाकर अपने सुपुत्र और वधु के लिए दुआएं मांगी, तो ये बात उनके कद की नहीं लगी। और सदी के सबसे बड़े कार्यरत कलाकार ने मीडिया को जिस तरह से शादी से दूर रखा, तो ये बात किसी को नहीं भाई। बीते हफ्ते दो ऐसे लेख देखने को मिले , जो अमिताभ बच्चन को एक सामान्य व्यक्ति साबित करने के लिए काफी है। एक व्यक्तिगत सामान्य भारतीय। भारतीय होना गर्व की बात है। लेकिन आप अगर कद्दावर हो, तो आपकी उठक बैठक पर सबकी नजर होती है। सो आप जो चरते है, वो सबके लिए खाद्य पदार्थ हो जाता है। अमिताभ ने जो ऊंचाईयां पाई है, उनमें जो भी किस्से जुड़े है, वे मीडिया की बदौतल ही परवान चढ़े है। चाहे वो उनका नामकरण हो या आकाशवाणी में उनका न चुना जाना। कलकत्ता से मुंबई आना या बरसों संघर्ष करना। आज वे युगपुरूष है, जिसके चारों और आज के युग निर्माता खड़े है। अनिल अंबानी से अमर सिंह तक। अमिताभ ने एक पेपर को कहा कि उनके बेटे की शादी कोई अवार्ड पार्टी नहीं थी। ठीक। लेकिन केवल उन्हे बुलाना जो आपको किसी न किसी मुकाम पर फिल्मी दुनिया में अवार्ड दिला सके, कहां तक सामान्यता है। यश चोपड़ा, करण जौहर और रामगोपाल वर्मा। ये वो फिल्मी चितेरे है, जो आज के फिल्म को बना और आगे बढ़ा रहे है। ये सही मायने में शहंशाह की च्वाइस है। बेटे के करियर का सवाल है क्या करें। अभिषेक को फिल्मी पर्दे पर टक्कर देन वाला कोई अभिनेता उनकी शादी में मौजूद नहीं था। शाहरूख,  रितिक, सलमान, आमिर सब नहीं थे। मानते है कि शादी में आपके खास तो होगें ही। पर खास भी फ्यूचर प्लानिंग के लिहाज से चुने हुए। अब बात करीबियत की। कौन कितना करीब है। अमर सिंह कार्ड पर थे, वे बचपन के दोस्त नहीं थे, राजीव गांधी की तरह। पर आज गांधी के हाथ की जगह सपा का साथ अमिताभ के लिए ज्यादा दोस्ताना है। ये बात मैं नहीं मीडिया पर हर दिन आपने देखी है। इलाहाबाद से कोई वास्ता न बचा हो, पर मुलायम सिंह की जनसभा में जया बच्चन शहर की बहू होने का वास्ता देकर वोट मांगती है। शादी में इलाहाबाद में किसी को नहीं बुलाया गया। पर अमिताभ की राजनीति की जंग का पहला मैदान इलाहाबाद था, और सब कुछ सामान्य रहा तो आगे भी होगा। अनिल अंबानी उनके दोस्त है और वे जानते है कि उनके साथ बार बार तिरूपति जाने से वे भागवान के ज्यादा कृपापात्र बने रहेंगे। लोगों की नजर में उनकी अहमियत आज भी कद या पद से नहीं है। वे सार्वकालिक प्रतिभावान कलाकार है। पर वहीं वे एक सामान्यता भी साथ ले कर चलते है। इससे वे लोगों के करीब थे। लेकिन जीवन के दूसरे पारिवारिक फैसले में फ्लाप साबित हुए है। अंधविश्वास, अतिदान, निजता, और दिखावे ने उन्हे भारतीय तो बना दिया है, पर एक फीके डायलाग के साथ। उम्मीद है आने वाले दिनों में हम किसी और तमाशे की ख्वाहिश इस महाकलाकार से नहीं करेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-6203481707001059786?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/6203481707001059786/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=6203481707001059786' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6203481707001059786'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/6203481707001059786'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/blog-post_10.html' title='सदी का सामान्य महानायक'/><author><name>Bhavya</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04680506436181806470</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://3.bp.blogspot.com/_m7ljgYpywK0/StHe0Vm236I/AAAAAAAAALk/0F5iDYClH7A/S220/SDC12115.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8144429829291861480.post-3330876993776513367</id><published>2007-05-02T05:14:00.000-07:00</published><updated>2007-05-02T05:17:13.451-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='Muslim'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='court'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='politics'/><title type='text'>ये छपा था....</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ये छपा था....http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_10.html&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लोग चुप रहे।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बहसें तमाम हुईं।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हम एक मजहब के हुए।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;जिंदगी आम हुई।&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुसलमां होना क्या होता है? ये जानना-समझना केवल फैसलों की छांव में मुश्किल है। दरअसल इस देश की साझा विरासत को जीने के लिए ही गंगा जमुनी तहजीब को रचा गया। आज के समाज में जब विचार पैदा करने वाले ज्यादातर माध्यम अपनी भूमिका से परे हैं, एक बुनियादी सवाल पर सबका चीखना समझदारी लगता है। देश में बीस करोड़ के लगभग के हमारे भाईयों को एक फैसले की दरकार थी, या जरूरत थी, ये कहना मुश्किल है। पर ये जानना जरूरी है कि ये फैसला अभी क्यों आया है। एक ऐसा चुनाव देश के सामने है, गुजर रहा है, जो देश की बदलती तस्वीर से बिल्कुल अलग गति से लड़ा और जीता जाता है। उत्तर प्रदेश पर अभी तक कोर्ट का कोई ऐसा फैसला नहीं आया है, जो यहां के पत्थरनुमा जातिगत ढांचे की तह में जाने का रास्ता दिखाये। सो मौका था कि हम ये जानें कि दरअसल इस प्रदेश में साढ़े तीन करोड़ के करीब मुसलमान हैं, और ये कुछ इलाको में बहुसंख्यक है, तो कुछ में अल्प प्रभावी। अल्पसंख्यक कहना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि जीने के लिए जो बुनियादी जरूरतें चाहिए वो इनके पास नहीं हैं, तो ये एक समुदाय है। एक वजूद को तलाशता समाज। कई बार ठगा जा चुका समाज। और इसके आंतरिक ताने बाने इतने पेचीदा हैं कि आप बाहर से इसे केवल एक झुंड मान सकते है। और इस झुंड का व्यवहार भी एक ही मानते आये हैं। कुंठा और हताशा केवल एक स्थिति को बता सकती है, लेकिन हर दिन खोते जाने का डर ज्यादा भयानक होता है। कहा जा रहा है कि जज साहब के ताल्लुकातों से फैसले के पेंच हैं। ये बात कितनी वज़नदार है, पता नहीं। लेकिन एक बड़ी पार्टी के एजेंडे के तौर पर मुस्लिम विरोध की सीडी का बंटवाया जाना और इसमें कही गयी बातों को फैसले के मर्म से जोड़ कर देखने पर कुछ कुछ साफ होता है। जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ा रहे है... और फैसला उन्हे बहुसंख्यक कहता है। ये महज संयोग भी हो सकता है। दूसरी पार्टी की आला महिला नेता इसे साज़‍िश बताती है। सही वक्त पर सही साज़‍िश। वे कहती है, मुसलमानों का पक्ष कमजोर तरीके से रखा गया। सत्तासीन सरकार ने ऐसा जान-बूझ कर किया। सत्तासीन सरकार के राज में हल्के दंगे और मदरसों में हादसे हो चुके हैं। सो वो चुप रहना बेहतर समझती हैं। राहत खुद अदालत से आ गयी। फैसला को बड़ी बेंच ने खुद ही रोक दिया गया। और एक विराम सा लग गया। ये विराम इस समुदाय पर कई बरसों से लगा है। विकास का विराम, पहचान का विराम और खुद को न बता पाने का विराम। कहा जाता है कि इस देश में हर चीज के पीछे राजनीति होती है। तो चश्मा उतार कर भी देखा जाए, तो कहीं न कहीं चुनाव और उन्हें भुनाने या किनारा लगाने की एक और मुहिम जारी है। गंगा में बहता पानी और जमुना के साथ संस्कृति में काफी कुछ बदल चुका है। नहीं बदली है, तो सोच और उसे पुष्ट करती राजनीति।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;मैं foryou2005@gmail.com पर मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-3330876993776513367?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/3330876993776513367/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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मौजदू हूं...&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8144429829291861480-5880136692621000759?l=bhavyakiduniya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/feeds/5880136692621000759/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8144429829291861480&amp;postID=5880136692621000759' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5880136692621000759'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8144429829291861480/posts/default/5880136692621000759'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://bhavyakiduniya.blogspot.com/2007/05/blog-post.html' title='आपके बीच....मैं 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